अहोई अष्टमी का व्रत कैसे रखा जाता हैं, जानिए शुभ मुहूर्त, पूजा विधि, कथा और आरती

अहोई अष्टमी का व्रत कैसे रखा जाता हैं ?

अहोई अष्टमी की अलसुबह स्नान करके अहोई की पूजा का संकल्प लें. अहोई माता की आकृति, गेरू या लाल रंग से दीवार पर बनाएं. सूर्यास्त के बाद तारे निकलने पर पूजा करें. पूजा की थाल में लिए जाने वाली सामग्री में एक चांदी या सफेद धातु की अहोई, चांदी की मोती की माला, जल से भरा हुआ कलश, दूध-भात, हलवा और पुष्प, दीप आदि रखें. व्रत रखने वाले उपासक को सबसे पहले अहोई माता की रोली, पुष्प, दीप से पूजा करना चाहिए. जिसके बाद उन्हें दूध भात अर्पित करें. अब हाथ में गेंहू के सात दाने और कुछ दक्षिणा (बयाना) लेकर अहोई की कथा सुनें. कथा के बाद माला गले में पहन लें और गेंहू के दाने तथा बयाना सासु मां को देकर उनका आशीर्वाद लें. अब तारों को अर्घ्य देकर व्रत को खोल सकते हैं. अहोई अष्टमी के दिन मीठे पुए बनाकर अपने बच्चों को आवाज लगाकर बुलाने की प्राचीन परंपरा भी निभाते हैं.

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सांकेतिक तस्वीर सोर्स गूगल

अहोई अष्टमी का महत्‍व

पौराणिक लोक मान्यताओं के अनुसार, अहोई अष्टमी एक माताएं अपनी संतान के लिए करती है. इस दिन माएं अपने बच्चों की खुशहाली की कामना के लिए व्रत का पालन करती हैं. चंद्रमा या तारों को देखने और पूजा करने के बाद ही यह उपवास खोला जाता है. इस दिन पुत्रवती स्त्रियां निर्जल व्रत रखती हैं और शाम के समय दीवार पर आठ कोनों वाली एक पुतली बनाती हैं. पुतली के पास ही स्याउ माता और उसके बच्चे भी बनाए जाते हैं.इतना ही नहीं नि:संतान महिलाएं भी संतान प्राप्ति की कामना के उद्देश्य से अहोई अष्टमी का व्रत करती हैं. यह व्रत करवा चौथ के ठीक चार दिन बाद अष्टमी तिथि को पड़ता है.

मान्यता है कि संतानविहीन या पुत्र विहीन महिलाएं संतान प्राप्ति की आशा में मथुरा जिले के राधाकुण्ड में पति के साथ स्नान करके अहोई अष्टमी का त्योहार मनाती हैं। इस संबंध में गर्ग संहिता और कई अन्य धार्मिक ग्रन्थों का जिक्र करते हुए मथुराधीश एवं मदनमोहन मन्दिरों की देखभाल कर रहे ब्रजेश मुखिया ने बताया कि श्रीकृष्ण और बलराम की हत्या के लिए कंस ने अरिष्ठासुर नामक राक्षस को भेजा था। गायों के समूह में बैल बनकर वह मिल गया था। गोचारण पर राधाकुण्ड के जंगल में गए श्रीकृष्ण को अपने पास बुलाने एवं उन पर आक्रमण करने के लिए उसने गायों एवं बछड़ों को जब मारना शुरू किया तो श्रीकृष्ण ने उसका बध कर उसे मोक्ष प्रदान किया था।

अहोई अष्टमी की व्रत कथा

गर्ग संहिता में उल्लेख मिलता है कि श्रीकृष्ण और बलराम की हत्या के लिए कंस ने अरिष्ठासुर नामक राक्षस को भेजा था. गायों के समूह में बैल बनकर वह घुस गया। गोचारण पर राधाकुण्ड के जंगल में गए श्रीकृष्ण को अपने पास बुलाने एवं उन पर आक्रमण करने के लिए उसने गायों एवं बछड़ों को जब मारना शुरू किया तो श्रीकृष्ण ने उसका बध कर उसे मोक्ष प्रदान किया. अरिष्टासुर के खत्म करने के बाद  राधारानी ने श्रीकृष्ण से कहा था कि उन्होंने गोवंश की हत्या की है अत: जब वे सात तीर्थों में स्नानकर आएंगे तभी वे उन्हें स्पर्श करेंगी. श्रीकृष्ण ने पास के स्थान में अपनी बांसुरी से कुण्ड खोदकर उसमें सभी तीर्थों के पानी आह्वान किया था. इसके बाद राधारानी ने अपने कंगन से कुण्ड खोद कर जल का आह्वान किया तो कान्हा ने अपने कुण्ड को राधारानी के कुण्ड से मिला दिया. जिससे श्रीकृष्ण द्वारा खोदे गए श्यामकुण्ड और राधारानी द्वारा खोदे गए राधाकुण्ड के जल मिलकर पवित्र हो गए. इसके बाद राधारानी ने राधा कुण्ड में स्नान किया था। उन्होंने इसके बाद श्रीकृष्ण से यह वरदान मांगा था कि जो विवाहित नि:संतान युगल अहोई अष्टमी को राधा कुण्ड में रात 12 बजे स्नान करें उन्हें संतान या पुत्र रत्न की प्राप्ति हो.व्रत करने वाली महिलाओं को मनोकामना पूरी करने के लिए किसी फल या सब्जी का सेवन करना छोड़ना होता है.

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अहोई अष्टमी की तिथि और पूजा का शुभ मुहूर्त

  • अहोई अष्‍टमी की तिथि: 8 नवंबर 2020
  • अष्टमी तिथि प्रारंभ: 8 नवंबर 2020 को सुबह 07 बजकर 29 मिनट से.
  • अष्टमी तिथि समाप्त: 9 नवंबर 2020 को सुबह 06 बजकर 50 मिनट तक.
  • पूजा का मुहूर्त: 8 नवंबर को शाम 05 बजकर 31 मिनट से शाम 06 बजकर 50 मिनट तक.
  • कुल अवधि: 1 घंटे 19 मिनट.
  • तारों को देखने का समय: 8 नवंबर 2020 को शाम 05 बजकर 56 मिनट.
  • चंद्रोदय का समय: 8 नवंबर 2020 को रात 11 बजकर 56 मिनट तक.

अहोई माता की आरती

॥ आरती अहोई माता की ॥

जय अहोई माता,जय अहोई माता।

तुमको निसदिन ध्यावतहर विष्णु विधाता॥

जय अहोई माता…॥

ब्रह्माणी, रुद्राणी, कमलातू ही है जगमाता।

सूर्य-चन्द्रमा ध्यावतनारद ऋषि गाता॥

जय अहोई माता…॥

माता रूप निरंजनसुख-सम्पत्ति दाता।

जो कोई तुमको ध्यावतनित मंगल पाता॥

जय अहोई माता…॥

तू ही पाताल बसंती,तू ही है शुभदाता।

कर्म-प्रभाव प्रकाशकजगनिधि से त्राता॥

जय अहोई माता…॥

जिस घर थारो वासावाहि में गुण आता।

कर न सके सोई कर लेमन नहीं धड़काता॥

जय अहोई माता…॥

तुम बिन सुख न होवेन कोई पुत्र पाता।

खान-पान का वैभवतुम बिन नहीं आता॥

जय अहोई माता…॥

शुभ गुण सुंदर युक्ताक्षीर निधि जाता।

रतन चतुर्दश तोकूकोई नहीं पाता॥

जय अहोई माता…॥

श्री अहोई माँ की आरतीजो कोई गाता।

उर उमंग अति उपजेपाप उतर जाता॥

जय अहोई माता…॥

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KAMLESH VERMA

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