भारत के स्वतंत्रता सग्राम में बिरसा मुंडा का योगदान, जानिए कैसे हुई इनकी मौत

 भारत के स्वतंत्रता सग्राम में बिरसा मुंडा का योगदान, जानिए कैसे हुई इनकी मौत

सांकेतिक तस्वीर : सोर्स गूगल

स्वतंत्रता सग्राम में बिरसा मुंडा का योगदान । Birsa Munda’s contribution to the freedom struggle in hindi

बिहार और झारखंड में जिस स्वतंत्रता सेनानी को बेहद ही सम्मान से ज़्यादा याद किया जाता है, वो हैं बिरसा मुंडा. बिरसा मुंडा(Birsa Munda) का जन्म 1875 में लिहतु (lihatu) में हुआ था. प्रारंभिक शिक्षा के चाईबासा इंग्लिश मिडिल स्कूल(Chaibasa at Gossner Evangelical Lutheran Mission school) में मुंडा ने पढ़ाई की. सुगना मुंडा और करमी हातू के पुत्र बिरसा मुंडा के मन में ब्रिटिश सरकार के खिलाफ बचपन से ही आक्रोश व्याप्त था. यह झारखंड के खुंती ज़िले के रहने वाले थे. बिरसा मुंडा ने 19वीं शताब्दी में अंग्रेजों के खिलाफ एक गुरिल्ला युद्ध की शुरुआत की थी. जिसे गुस्साई ब्रिटिश हुकूमत ने मुंडा को पकड़कर रांची जेल में बंद कर दिया था. साल 1900, केवल 25 साल की आयु में कॉलरा के कारण मुंडा मौत हो गई. आइये लेख के जरिए जानें स्वतंत्रता सग्राम में बिरसा मुंडा का योगदान.

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सांकेतिक तस्वीर : सोर्स गूगल

स्वतंत्रता सग्राम में बिरसा मुंडा का योगदान । Birsa Munda’s contribution to the freedom struggle in hindi

  • मुंडा लोग बिरसा मुंडा को धरती का पिता यानी ‘धरती अबा’ के नाम से संबोधित करते हैं.
  •  मुंडा ने 28 जून, 1898 को सामाजिक बराबरी के लिए चुटिया के मंदिर अभियान की शुरूआत की और एक नेता के रूप में लोगों के सामने आए.
  •  1899 में क्रिसमस के दौरान  7000 आदमी और औरतें इकट्ठा हुए और क्रांति की घोषणा की. जो जल्द ही खुंती, तमार, बसिया और रांची तक फैल गई. 5 जनवरी 1900 तक सारी मुंडा जनजाति ने हथियार उठा लिए. बहुत से पुलिस वाले मार दिए गए और करीब 100 इमारतों में आग लगा दी गई. अबुआ दिसुन यानी स्वराज्य कायम हो गया.
  • जिसके बाद अंग्रेजों ने सेना भेजी. साथ ही बिरसा मुंडा को गिरफ्तार करने के लिए अंग्रेजाें ने 500 रुपये का इनाम घोषित किया गया. डुम्बारी पहाड़ी पर वैसा ही एक काण्ड ब्रिटिश सेना ने किया, जैसा जलियांवाला बाग के समय हुआ था. घटना में सैकड़ों लोग मारे गए. मंजर ये था कि सारी पहाड़ी पर लाशें बिछि पड़ी हुई थीं. इस बेहद ही गंभीर जनसंहार के बाद लाशों को खाई में फेंक दिया गया था. घटना से लोगों को जिन्दा जला दिया गया था.
  • स्टेट्समैन ने घटना को लेकर 25 मार्च को 400 लोगों की मौत की बात लिखी थी. लेकिन यह सारी बातें एडमिनिस्ट्रेशन ने बरबरता पूर्वक दबा दीं. डुम्बारी पहाड़ी का नाम बदलकर ‘टॉप्प्ड बुरु’ कर दिया गया. बदले गए नाम का अर्थ है ‘मौत का टीला.’
  • बिरसा जाम्क्रोपी के जंगल में आरम कर रहे थे. इसी बीच 3 मार्च, 1900 को रांची के डिप्टी कमिश्नर ने उन्हें गिरफ्तार जेल में डाल दिया. मामले में 15 अलग-अलग केस में 460 लोगों को पुलिस ने पकड़ा था. एक को मौत की सजा हुई. 39 को काला पानी. 23 को उम्रकैद.
  •  जेल में ही बिरसा की 9 जून 1900 को मौत हो गई. 10 महीने तक जेल में कैद लोगों पर इतना अत्याचार किया गया कि 6 लोगों की मौत हो गई. आदिवासी नायक बिरसा मुंडा भी उनमें से एक थे.
  • अगस्त 1897 में बिरसा मुंडा और उनके चार सौ सिपाहियों ने तीर कमान के साथ खूंटी थाने पर धावा बोला.

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KAMLESH VERMA

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