एकादशी के दिन चावल खाना क्यों वर्जित है ?

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एकादशी के दिन चावल खाना क्यों वर्जित है ? ekadashi ke din chawal kyon nahin khana chahie bataiye
वर्ष के प्रत्येक माह में एकादशी आती है. हिंदू धर्म में एकादशी व्रत का बेहद ही महत्वपूर्ण स्थान है. व्रत करने वाले आराधकों के घरों में इस दिन चावल खाया जाना वर्जित माना जाता है. इसके पीछे एक वैज्ञानिक रहस्य है. एकादशी के दिन चावल नहीं खाने चाहिए, जो खाता है समझो वह एक-एक चावल का दाना खाते समय एक-एक कीड़ा खाने का पाप करता है. अब आपके मन में सवाल उठ रहा होगा कि, ‘इस प्रकार कैसे हानि होती होगी ? क्या होता होगा ?’ चलिए लेख के जरिए जानते हैं. एकादशी के दिन चावल खाना क्यों वर्जित है ? ekadashi ke din chawal kyon nahin khana chahie bataiye
एकादशी को चावल खाए जाने को लेकर हिंदू शास्त्रों में उल्लेख मिलता है कि, प्रतिपदा से लेकर अष्टमी तक वातावरण में से, हमारे शरीर में से जलीय अंश का शोषण होता है, भूख ज्यादा लगती है और अष्टमी से लेकर पूनम या अमावस्या तक जलीय अंश शरीर में बढ़ता है, भूख कम होने लगती है.
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चावल पैदा होने और चावल बनाने में खूब पानी लगता है. चावल खाने के बाद भी जलीय अंश ज्यादा उपयोग में आता है. पानी से बने रक्त व प्राण की गति पर चन्द्रमा की गति का प्रभाव बहुत अधिक पड़ता है क्योंकि सभी जल तथा जलीय पदार्थों पर चन्द्रमा का अधिक प्रभाव पड़ता है.
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ऐसे में यदि एकादशी को जलीय अंश की अधिकतावाले पदार्थ जैसे चावल आदि खायेंगे तो चन्द्रमा के कुप्रभाव से हमारे स्वास्थ्य और सुव्यवस्था पर कुप्रभाव पड़ता है. जैसे- कीड़े मरे या कुछ अशुद्ध खाया तो मन विक्षिप्त होता है, ऐसे ही चावल खाने से भी मन का विक्षेप बढ़ता है. अब यह वैज्ञानिक समाधान मिला कि अष्टमी के बाद जलीय अंश आंदोलित होता है और इतना आंदोलित होता है कि आप समुद्र के नजदीक डेढ़-दो सौ किलोमीटर तक के क्षेत्र के पेड़-पौधों को अगर उन दिनों में काटते हो तो उनको रोग लग जाता है.
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वैज्ञानिकों ने शोध में पाया है कि, मनुष्य को हफ्ते में एक बार व्रत या लंघन करना (उपवास रखना) चाहिए लेकिन भारतीय संस्कृति कहती है. लाचारी का नाम लंघन नहीं… भगवान की प्रीति हो और उपवास भी हो. ‘उप’ माने समीप और ‘वास’ माने रहना – भगवद्-भक्ति, भगवद्-ध्यान, भगवद्-ज्ञान, भगवद्-स्मृति के नजदीक आने का भारतीय संस्कृति ने अवसर बना लिया.
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