होली 2026 कब है (Holi 2026 Kab Hai): सनातन धर्म के सबसे प्रमुख एवं उल्लासपूर्ण त्योहारों में से एक होली 2026 को लेकर यदि आपके मन में तारीख और शुभ मुहूर्त को लेकर संशय है, तो काशी व मिथिला पंचांग के अनुसार यह स्पष्ट हो गया है। वर्ष 2026 में होलिका दहन 3 मार्च 2026 (मंगलवार) को फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा के पावन अवसर पर किया जाएगा, जबकि रंगों का महापर्व धुलंडी (रंगोत्सव) 4 मार्च 2026 (बुधवार) को चैत्र कृष्ण प्रतिपदा पर देश-विदेश में अत्यंत हर्षोल्लास के साथ मनाया जाएगा।
धर्मग्रंथों जैसे निर्णयसिंधु और धर्मसिंधु के अनुसार होलिका दहन हमेशा भद्रा रहित प्रदोष काल में ही किया जाना चाहिए। भद्रा काल में होलिका दहन करने से लोक व समाज में अनिष्ट और कष्ट की आशंका रहती है। इस वर्ष 3 मार्च 2026 की शाम को भद्रा समाप्त होने के बाद शाम 06:24 बजे से रात 08:52 बजे तक होलिका दहन का अत्यंत श्रेष्ठ एवं कल्याणकारी मुहूर्त प्राप्त हो रहा है। आइए इस विशेष लेख में होलिका दहन का पंचांग समय, भद्रा काल की सटीक स्थिति, शहरवार मुहूर्त, संपूर्ण पूजा विधि, सामग्री और पौराणिक कथा का विस्तार से अध्ययन करें।
📌 होली 2026: एक नज़र में मुख्य पंचांग बिंदु
- पर्व का नाम: होली 2026 (फाल्गुनी पूर्णिमा व धुलंडी)
- होलिका दहन की तिथि: 3 मार्च 2026, मंगलवार (फाल्गुन पूर्णिमा)
- होलिका दहन शुभ मुहूर्त: शाम 06:24 बजे से रात 08:52 बजे तक (अवधि: 2 घंटे 28 मिनट)
- भद्रा पूंछ का समय: 3 मार्च शाम 05:12 से 06:22 बजे तक
- भद्रा मुख का समय: शाम 06:22 बजे समाप्त
- रंगों वाली होली (धुलंडी): 4 मार्च 2026, बुधवार (चैत्र कृष्ण प्रतिपदा)
- पूर्णिमा तिथि प्रारंभ: 3 मार्च 2026 को दोपहर 03:15 बजे
- पूर्णिमा तिथि समाप्त: 4 मार्च 2026 को दोपहर 01:25 बजे
1. होली 2026 कब है: पंचांग गणना व तिथियों का संपूर्ण विश्लेषण
वैदिक ज्योतिष के अनुसार, फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को होलिका दहन का पर्व मनाया जाता है और इसके अगले दिन चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि को रंगों वाली होली (जिसे धुलंडी या धूलिवंदन भी कहा जाता है) का उत्सव मनाया जाता है।
वर्ष 2026 में फाल्गुन पूर्णिमा तिथि 3 मार्च 2026 को दोपहर 03:15 बजे से प्रारंभ होगी और यह 4 मार्च 2026 को दोपहर 01:25 बजे तक रहेगी। शास्त्रानुसार होलिका दहन के लिए प्रदोष व्यापिनी पूर्णिमा का होना अनिवार्य है। चूंकि 3 मार्च की रात्रि में पूर्णिमा तिथि प्रदोष काल को व्याप्त कर रही है, अतः होलिका दहन 3 मार्च 2026 को ही विधिपूर्वक किया जाएगा। उदयातिथि में प्रतिपदा 4 मार्च को होने के कारण रंगोत्सव 4 मार्च को मनेगा।
होलिका दहन में भद्रा का विचार क्यों है आवश्यक?
शास्त्रों में स्पष्ट निर्देश दिया गया है:
“भद्रायां द्वे न कर्तव्ये श्रावणी फाल्गुनी तथा। श्रावणी नृपतिं हन्ति ग्रामं दहति फाल्गुनी॥”
अर्थात भद्रा काल में दो कार्य कदापि नहीं करने चाहिए—श्रावणी (रक्षाबंधन) और फाल्गुनी (होलिका दहन)। यदि भद्रा में रक्षाबंधन किया जाए तो राजा का अनिष्ट होता है और यदि भद्रा में होलिका दहन किया जाए तो पूरे राज्य और समाज में अग्निभय तथा विनाश होता है।
3 मार्च 2026 को भद्रा का साया शाम 06:22 बजे पूरी तरह समाप्त हो जाएगा। इसके तुरंत बाद शाम 06:24 बजे से रात 08:52 बजे तक प्रदोष काल का अमृत मुहूर्त मिलेगा, जो होलिका दहन के लिए शत-प्रतिशत दोषमुक्त और फलदायी है।
2. होलिका दहन 2026 शुभ मुहूर्त: भारत के प्रमुख शहरों की समय सारिणी
सूर्यास्त के समय में विभिन्न राज्यों और शहरों के भौगोलिक देशांतर के अनुसार कुछ मिनटों का अंतर आता है। नीचे भारत के प्रमुख 10 महानगरों में होलिका दहन 2026 के शुभ समय की विस्तृत तालिका प्रस्तुत की गई है:
| शहर / राज्य | होलिका दहन शुभ मुहूर्त (प्रदोष काल) | स्थानीय सूर्यास्त | भद्रा की स्थिति |
|---|---|---|---|
| नई दिल्ली (Delhi NCR) | शाम 06:24 से रात 08:52 | 06:22 PM | भद्रा मुक्त ✅ |
| वाराणसी (काशी), UP | शाम 06:05 से रात 08:35 | 06:03 PM | भद्रा मुक्त ✅ |
| लखनऊ, उत्तर प्रदेश | शाम 06:14 से रात 08:42 | 06:12 PM | भद्रा मुक्त ✅ |
| पटना, बिहार | शाम 05:56 से रात 08:26 | 05:54 PM | भद्रा मुक्त ✅ |
| जयपुर, राजस्थान | शाम 06:31 से रात 08:58 | 06:29 PM | भद्रा मुक्त ✅ |
| मुंबई, महाराष्ट्र | शाम 06:45 से रात 09:10 | 06:43 PM | भद्रा मुक्त ✅ |
| कोलकाता, पश्चिम बंगाल | शाम 05:41 से रात 08:12 | 05:39 PM | भद्रा मुक्त ✅ |
| भोपाल, मध्य प्रदेश | शाम 06:27 से रात 08:54 | 06:25 PM | भद्रा मुक्त ✅ |
3. होलिका पूजन की प्रामाणिक वैदिक विधि (Step-by-Step Puja Vidhi)
होलिका दहन से पूर्व सायंकाल में होलिका माता और भक्त प्रहलाद का विधिपूर्वक पूजन किया जाता है। ऐसा करने से परिवार में सुख, शांति, आरोग्य और सुखद भविष्य की प्राप्ति होती है:
- शुद्धिकरण व संकल्प: सर्वप्रथम स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें। हाथ में जल, अक्षत और पुष्प लेकर होलिका पूजन का संकल्प लें।
- भगवान नरसिंह व भक्त प्रहलाद का ध्यान: भगवान श्रीहरि विष्णु के नृसिंह अवतार और परम भक्त प्रहलाद का स्मरण करते हुए उन्हें प्रणाम करें।
- रोली, अक्षत व पुष्प अर्पण: होलिका के स्थान पर रोली, कुमकुम, हल्दी, साबुत चावल और ताजे फूल अर्पित करें।
- बड़कूले की माला चढ़ाना: गाय के शुद्ध गोबर से बने उपले (बड़कूले / गुलेरी) की माला होलिका को समर्पित करें। पितरों, भाइयों और परिवार के कल्याण हेतु मालाएं अर्पित की जाती हैं।
- कच्चा सूत लपेटना: सफेद कच्चा सूत (कलावा) लेकर होलिका के चारों ओर 3, 5 या 7 बार लपेटते हुए परिक्रमा करें।
- नई फसलों का भोग: गेहूं, जौ और चने की ताजी हरी बालियों को होलिका की अग्नि में सेंकें। इस भुने हुए अन्न (होलाक) को परिवार के सभी सदस्यों में प्रसाद रूप में बांटें।
- अग्नि प्रज्वलन व आहुति: शुभ मुहूर्त (शाम 06:24 से 08:52 के मध्य) में अग्नि प्रज्वलित करें। अग्नि में बताशे, गुड़, नारियल, जौ और घी की आहुति दें।
“अहकूटा भयत्रस्तैः कृता त्वं होलि बालिशैः। अतस्वां पूजयिष्यामि भूते भूतिप्रदा भव॥”
भावार्थ: हे होलिका! अज्ञानी लोगों द्वारा भयवश तेरी रचना की गई, किंतु मैं तेरा पूजन करता हूँ ताकि तू हम सभी के लिए समस्त ऐश्वर्य और कल्याण प्रदान करने वाली हो।
4. होलिका दहन और होली की पौराणिक व आध्यात्मिक कथाएं
होली के पर्व के साथ केवल एक नहीं, बल्कि भारतीय सनातन संस्कृति की तीन अत्यंत पावन और प्रेरणादायक गाथाएं जुड़ी हुई हैं:
1. भक्त प्रहलाद और होलिका की अमर कथा
पौराणिक मान्यता के अनुसार, दैत्यराज हिरण्यकश्यप स्वयं को ईश्वर मानता था और अपनी प्रजा को केवल अपनी पूजा करने का आदेश देता था। परंतु उसका अपना पुत्र प्रहलाद भगवान विष्णु का अनन्य भक्त था। हिरण्यकश्यप ने प्रहलाद को मारने के अनेक प्रयास किए। अंत में उसने अपनी बहन होलिका को बुलाया, जिसे ब्रह्मा जी से अग्नि में न जलने वाली दिव्य चादर का वरदान प्राप्त था।
होलिका प्रहलाद को अपनी गोद में लेकर जलती हुई चिता में बैठ गई। परंतु प्रहलाद निरंतर नारायण नाम का जप करते रहे। प्रभु कृपा से वह दिव्य वस्त्र उड़कर प्रहलाद के ऊपर आ गया और पापिनी होलिका अग्नि में भस्म हो गई। यह प्रसंग सिद्ध करता है कि बुराई कितनी भी शक्तिशाली क्यों न हो, ईश्वर भक्ति और सत्य के सम्मुख उसका विनाश अवश्यंभावी है।
2. कामदेव का भस्म होना और शिवजी का वैराग्य
एक अन्य कथा के अनुसार, माता सती के देहत्याग के बाद भगवान शिव घोर समाधि में लीन हो गए। तारकासुर के अत्याचार से मुक्ति पाने हेतु देवताओं ने कामदेव को शिवजी की समाधि भंग करने भेजा। कामदेव ने पुष्प-बाण से शिवजी पर काम भाव जागृत करने का प्रयास किया। कुपित होकर भगवान शिव ने अपना तीसरा नेत्र खोल दिया और कामदेव भस्म हो गए। बाद में रति के करुण विलाप पर शिवजी ने कामदेव को अनंग (बिना शरीर के) पुनर्जीवित करने का वरदान दिया। इस आनंद में फाल्गुन पूर्णिमा को उत्सव मनाया जाता है।
3. भगवान श्री कृष्ण और राधा रानी का ब्रज रंगोत्सव
द्वापर युग में ब्रज में भगवान श्रीकृष्ण ने राधा रानी और गोपियों के साथ प्राकृतिक फूलों और गुलाल से रंग खेलने की परंपरा प्रारंभ की। मथुरा, वृंदावन, बरसाना और नंदगांव की लट्ठमार होली, फूलों की होली और लड्डू होली आज भी विश्वप्रसिद्ध है। यह पर्व आत्मा और परमात्मा के असीम प्रेम का प्रतीक है।
5. होलिका दहन की भस्म के अचूक वास्तु व ज्योतिषीय उपाय
शास्त्रों के अनुसार होलिका दहन की अग्नि और उसकी राख (भस्म) में नकारात्मक शक्तियों को नष्ट करने की अद्भुत ऊर्जा होती है। 4 मार्च की सुबह धुलंडी के दिन होलिका की ठंडी भस्म घर लाकर निम्न उपाय किए जाते हैं:
- आरोग्य व नजर दोष से मुक्ति: होलिका दहन की भस्म का तिलक घर के सभी सदस्यों, विशेषकर बच्चों के माथे पर लगाने से बुरी नजर और अकाल भय से रक्षा होती है।
- आर्थिक समृद्धि का उपाय: थोड़ी सी भस्म को लाल कपड़े में बांधकर थोड़े अक्षत और एक चांदी के सिक्के के साथ अपनी तिजोरी अथवा धन स्थान में रखने से वर्षभर बरकत बनी रहती है।
- वास्तु दोष निवारण: इस पवित्र भस्म को घर के चारों कोनों में छिड़कने से घर की नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है और सकारात्मक तरंगों का संचार होता है।
- ग्रह शांति: यदि जन्मकुंडली में राहु-केतु अथवा शनि का अशुभ प्रभाव हो, तो होलिका की भस्म को शिवलिंग पर अर्पित करने से तुरंत शांति मिलती है।
6. 4 मार्च धुलंडी: सुरक्षित और पर्यावरण-अनुकूल रंगोत्सव के नियम
4 मार्च 2026 को रंगों वाली होली (धुलंडी) खेलते समय अपनी त्वचा, आंखों और पर्यावरण की सुरक्षा का विशेष ध्यान रखें:
- हर्बल व प्राकृतिक रंगों का उपयोग: पलाश (टेसू) के फूलों, हल्दी, चंदन, चुकंदर और गेंदे के फूलों से बने प्राकृतिक अबीर-गुलाल का ही प्रयोग करें।
- केमिकल और पक्के रंगों से परहेज: कांच के बुरादे, लेड, कॉपर सल्फेट युक्त काले या हरे पक्के रंगों से बचें, जो त्वचा और आंखों को गंभीर नुकसान पहुंचा सकते हैं।
- त्वचा व बालों की सुरक्षा: रंग खेलने से पूर्व शरीर और बालों में सरसों या नारियल का तेल अच्छी तरह लगा लें, जिससे रंग आसानी से छूट जाए।
- पशु-पक्षियों का सम्मान: बेजुबान जानवरों या श्वानों पर कभी भी रंग न डालें। इससे उनकी त्वचा में गंभीर संक्रमण हो सकता है।
7. होली 2026 से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (Frequently Asked Questions – FAQ)
Q1: होली 2026 में कब है और होलिका दहन की सही तारीख क्या है?
उत्तर: वर्ष 2026 में होलिका दहन 3 मार्च 2026 (मंगलवार) को फाल्गुन पूर्णिमा के दिन होगा। इसके अगले दिन 4 मार्च 2026 (बुधवार) को रंगों वाली होली (धुलंडी) मनाई जाएगी।
Q2: होलिका दहन 2026 का शुभ मुहूर्त क्या है?
उत्तर: 3 मार्च 2026 को होलिका दहन का सबसे शुभ प्रदोष काल मुहूर्त शाम 06:24 बजे से रात 08:52 बजे तक रहेगा। इस दौरान भद्रा समाप्त हो चुकी होगी, जिससे दहन पूर्णतः शास्त्रसम्मत और कल्याणकारी माना जाएगा।
Q3: क्या भद्रा में होलिका दहन किया जा सकता है?
उत्तर: कदापि नहीं। धर्मसिंधु के अनुसार भद्रा में होलिका दहन करने से हानि और अनिष्ट होता है। 3 मार्च को भद्रा शाम 06:22 बजे समाप्त होगी, अतः 06:24 बजे के बाद ही दहन किया जाना शास्त्रसम्मत है।
Q4: होलिका पूजन में किन सामग्रियों की आवश्यकता होती है?
उत्तर: एक लोटा जल, रोली, अक्षत, फूल, कच्चा सूत (कलावा), बताशे, गुड़, हल्दी की गांठ, साबुत मूंग, नई गेहूं व चने की बालियां और गोबर से बने बड़कूले आवश्यक होते हैं।
Q5: होलिका दहन की भस्म का क्या महत्व है?
उत्तर: होलिका दहन की भस्म को पवित्र मानकर माथे पर लगाने से नकारात्मक ऊर्जा और रोगों से रक्षा होती है। इसे तिजोरी में रखने से धन-समृद्धि की वृद्धि होती है।
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अस्वीकरण: यह आलेख काशी व मिथिला पंचांग, निर्णयसिंधु एवं शास्त्रीय मान्यताओं के आधार पर पाठकों की जानकारी हेतु तैयार किया गया है। स्थानीय अक्षांश-देशांतर भेद के कारण मुहूर्त में कुछ मिनटों का अंतर संभव है।







