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Home - कथाएँ - कबीर पंथ : स्थापना से वर्तमान यात्रा
कथाएँ KAMLESH VERMABy KAMLESH VERMA

कबीर पंथ : स्थापना से वर्तमान यात्रा

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कबीर पंथ स्थापना से वर्तमान यात्रा
कबीर पंथ स्थापना से वर्तमान यात्रा

‘कबीर पंथ’ एक ऐसा पंथ है जो सदगुरु कबीर साहब के संदेशों को समाज जीवन में स्थापित करने के लिए प्रतिबद्ध है। सदगुरु कबीर की साखियों और पदों के माध्यम से मानवीय जीवन मूल्यों को समाज में आचरणीय बनाना जिसका लक्ष्य है।

‘सदगुरु कबीर साहब’ जिससे भारत ही नहीं सारी दुनिया परिचित है। कबीरपंथी उन्हें ‘सदगुरु’ कहते हैं, साहित्यकार उन्हें ‘भक्तकवि’ कहते हैं और समाजसेवी उन्हें ‘समाज सुधारक’ के रूप में याद करते हैं। इस लेख में भी उनके लिए ‘सदगुरु’ ही लेखन अधिक युक्तिसंगत और उपयुक्त है क्योंकि सदगुरु कबीर की वाणियों को अपने जीवन का अभिन्न अंग माननेवाला हमारा सामान्य भारतीय समाज अपने पथदर्शक को ‘सदगुरु, गुरु अथवा संत’ के रूप में स्मरण करता है।

परन्तु हमारे ही देश के कुछ तथाकथित विद्वानों ने सदगुरु कबीर साहब को ‘कबीरदास’ कहकर उनकी वाणियों को महज एक समाज सुधारक कवि के रूप में मंडित करना शुरू कर दिया, जो अबतक शुरू है। इतना ही नहीं तो कबीर पंथ के नाम पर अनेकों की दुकानें भी खुल गईं, जिसका एक उदाहरण (रामपाल) के रूप में उजागर हुआ है। आज इस समाज में जिस तरह पाखंडी बाबाओं की पोल खुल रही है, ऐसे में कबीर पंथ के उस महान परम्परा पर ध्यान केन्द्रित हो जाता है जो विगत 500 वर्षों से लगातार सदगुरु की वाणी-वचनों को देश और दुनिया तक पहुंचा रहा है।

भारतीय दर्शन को सहज, सुगम, सटीक और सही परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत करनेवाले सदगुरु कबीर साहब की वाणियों और उसके संवाहक आचार्यों की परम्परा का स्मरण इस दृष्टि से भी आवश्यक है, क्योंकि वर्तमान वर्ष ‘श्री सदगुरु कबीर धर्मदास साहब वंशावली’ का पंच शताब्दी में प्रवेश कर गया है।

कबीर साहित्य  

सदगुरु कबीर साहब ने अपने जीवनकाल में अनगिनत बातें कहीं, जो श्रुति रूप में आज भी देश के अनेक बोली-भाषाओं में प्रचलित है। पर वाणियों की प्रामाणिकता और विश्वसनीयता के तौर पर कबीरपंथ में अनेक ग्रंथ संगृहित है। साहित्य जगत में ‘बीजक’ को ही प्रामाणिक माना गया, तब हिंदी साहित्य के प्रखर विद्वान् आचार्य पंडित हजारीप्रसाद द्विवेदी ने अपनी रचना ‘कबीर’ में अनेक ग्रंथों का आधार लेकर यह बताने का सार्थक प्रयत्न किया कि महज कुछ पृष्ठों में संकलित ‘बीजक’ एकमात्र प्रामाणिक ग्रंथ नहीं हो सकता।

इसपर यह तर्क दिया जा सकता है कि साधारण लेखक भी अपने जीवन काल में 20 से अधिक किताबों की रचना कर सकता है, तो सदगुरु कबीर जैसे प्रखर और क्रांतिकारी व्यक्तित्व का धनी अपने 119 वर्ष की आयु में केवल एक छोटी सी पुस्तिका में समा जाए, क्या इतनी ही वाणी कही होगी? भोर से संध्या तक समाज में व्याप्त कुरीतियों को समाप्त करने तथा समाज में नीति मूल्यों को स्थापित करने के लिए सार्थक प्रयत्न करनेवाले सदगुरु कबीर साहब ने निश्चय ही अनगिनत वाणियां कहीं हैं। आज जब हम उन वाणियों को पढ़ते-समझते और उससे प्रेरणा लेते हैं, तो उसके स्रोत को समझना बेहद जरुरी है।

सदगुरु कबीर साहब के वाणियों के लेखक और संकलनकर्ता धनी धर्मदास  

यूं तो धर्मदास साहब का नाम जुडावनदास था, परन्तु सदगुरु कबीर साहब के प्रति अनन्य भक्ति और समर्पण के चलते उन्होंने अपनी सारी सम्पत्ति समाजहित के लिए अर्पित कर दी। और तब सदगुरु को ‘नाम दान’ देकर धनी बना दिया और वे धनी धर्मदास कहलाए। इस सन्दर्भ में धर्मदास साहब ने लिखा है :-

संतों! हम तो सत्यनाम व्यापारी।

कोई कोई लादे कांसा पीतल, कोई कोई लौंग सुपारी।

हम तो लादे नाम धनी को, पूरन खेप हमारी।

पूंजी न घटी नफा चौगना, बनिज किया हम भारी।

नाम पदारथ लाद चला है, धर्मदास व्यापारी।।

धर्मदास साहब का जन्म मध्य प्रदेश के बांधवगढ़ में विक्रम संवत 1452 की कार्तिक पूर्णिमा को हुआ था। विकम संवत 1519 में व्यापार और तीर्थाटन के दौरान मथुरा में सदगुरु कबीर साहब से उनका सम्पर्क हुआ। उनकी दूसरी मुलाकात वि.सं. 1520 में हुई, जिसके बाद सदा के लिए सदगुरु ने उन्हें अपना बना लिया। धर्मदास साहब के निवेदन पर सदगुरु उनके गृहग्राम बांधवगढ़ आए। सदगुरु ने धर्मदास साहब, उनकी धर्मपत्नी आमीनमाता साहिबा और उनके द्वितीय पुत्र चुरामणिनाम साहब को आरती चौका कर दीक्षा प्रदान की। उल्लेखनीय है कि सदगुरु कबीर साहब ने धर्मदास साहब को नाम दान के साथ ही अटल ब्यालीस वंश का आशीर्वाद दिया, जिसके फलस्वरूप वि.सं.1538 में चुरामणि नाम साहब का प्रागट्य हुआ।

धनी धर्मदास साहब ने अनथक परिश्रम कर सदगुरु कबीर की अनगिनत वाणियों में से बहुत सी वाणियों को लिपिबद्ध किया, जिससे कुछ ग्रंथों की निर्मिती हो पाई, – बीजक, शब्दावली, साखीग्रंथ, कबीर सागर, सागर में ज्ञान सागर, अनुराग सागर, अम्बु सागर, विवेक सागर, सर्वज्ञ सागर, बोध सागर, ज्ञान प्रकाश, आत्मबोध, स्वसमवेद बोध, धर्म बोध, ज्ञान बोध, भवतारण बोध, मुक्ति बोध, चौका स्वरोदय, कबीर बानी, कर्म बोध, अमर मूल, ज्ञान स्थिति बोध, संतोष बोध, काया पांजी, पंच मुद्रा, श्वांस गुंजार, आगम-निगम बोध, सुमिरन बोध, गुरु महात्म्य, जीव धर्म बोध, स्वतंत्र ग्रंथ पूनो महात्म्य, ज्ञान स्वरोदय, गुरु गीता, आगम सन्देश, हंस मुक्तावली आदि। यह ज्ञान रूपी धन समाज जीवन में अविरल प्रवाहित होती रहे, इसके लिए सदगुरु कबीर साहब ने पंथ की स्थापना की और इसका दायित्व धनी धर्मदास और उनके ब्यालीस वंशों को दी।

कबीर पंथ की स्थापना और उनके संवाहक आचार्य 

संत कबीर
संत कबीर

गुरुगद्दी और कार्यकाल

गुरुगद्दी और कार्यकाल
गुरुगद्दी और कार्यकाल

सदगुरु कबीर साहब और धनी धर्मदास गुरु-शिष्य परम्परा के आदर्श हैं। धर्मदास साहब ने कबीर पंथ की आधारशिला रखनेवाले धर्मदास साहब का लोक गमन (निर्वाण) वि.सं. 1569 को हुआ। इसके बाद विक्रम संवत 1570 में स्वयं सदगुरु कबीर साहब ने धर्मदास साहब की धर्मपत्नी आमीनमाता साहिबा और संत समाज की उपस्थिति में उनके द्वितीय पुत्र चुरामणि नाम साहब जिन्हें मुक्तामणिनाम साहब भी कहा जाता है, को तिलक लगाकर गुरु गद्दी पर बैठाया। इस प्रकार मुक्तामणिनाम साहब कबीर पंथ के प्रथम आचार्य हुए। यह कबीर पंथ ‘श्री सदगुरु कबीर धर्मदास साहब वंशावली’ के नाम से आज दुनियाभर में जाना जाता है। कबीर पंथ के आचार्य को पंथ श्री कहा जाता है। कबीर पंथ के वंश परम्परा में गुरुगद्दी का स्थान और कालखंड प्रस्तुत है:-

पंथ श्री वचनवंश मुक्तामणिनाम साहब (बांधवगढ़, वि.सं 1570 से वि.सं. 1638 कुदुरमाल)

पंथ श्री सुदर्शननाम साहब (कुदुरमाल, वि.सं 1630 से वि.सं. 1690 रतनपुर)

पंथ श्री कुलपतिनाम साहब (रतनपुर, वि.सं 1690 से वि.सं. 1750 कुदुरमाल)

पंथ श्री प्रबोधगुरु (बालापीर) नाम साहब (कुदुरमाल, वि.सं 1750 से वि.सं. 1775 मंडला)

पंथ श्री केवलनाम साहब (मंडला, वि.सं 1775 से वि.सं. 1800 धमधा)

पंथ श्री अमोलनाम साहब (धमधा, वि.सं 1800 से वि.सं. 1825 मंडला)

पंथ श्री सुरतिसनेहीनाम साहब (मंडला, वि.सं 1825 से वि.सं. 1853 सिंघोड़ी)

पंथ श्री हक्कनाम साहब (सिंघोड़ी, वि.सं 1853 से वि.सं. 1890 कवर्धा)

पंथ श्री पाकनाम साहब (कवर्धा, वि.सं 1890 से वि.सं. 1912 कवर्धा)

पंथ श्री प्रगटनाम साहब  (कवर्धा, वि.सं 1912 से वि.सं. 1939 कवर्धा)

पंथ श्री धीरजनाम साहब (कवर्धा, 1936 में गद्दीशीन होने से पूर्व लोक गमन)

पंथ श्री उग्रनाम साहब (कवर्धा, वि.सं 1939 से वि.सं. 1971 दामाखेड़ा)

पंथ श्री दयानाम साहब  (दामाखेड़ा, वि.सं 1971 से वि.सं. 1984 दामाखेड़ा)

पंथ श्री गृन्धमुनिनाम साहब (दामाखेड़ा, वि.सं 1995 से वि.सं. 2048 दामाखेड़ा)

पंथ श्री प्रकाशमुनिनाम साहब (दामाखेड़ा, वि.सं 2046 से वर्तमान)

कबीर पंथ की वंशावली

kabir-panth
kabir-panth

इस प्रकार कबीर पंथ में 15 आचार्यों की पीढ़ी सेवारत हैं, जिन्होंने देश-विदेश में भ्रमण कर सदगुरु के वचनों को प्रसारित करने का कार्य किया। कबीर पंथ के 14वें आचार्य गृन्धमुनिनाम साहब के कार्यकाल में कबीर पंथ का तेजी से विस्तार हुआ। हिंदी साहित्य के प्रकांड विद्वानों, यथा,- आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी, महादेवी वर्मा, डॉ. रामकुमार वर्मा जैसे साहित्यकार पंथ श्री गृन्धमुनिनाम साहब की विद्वता और ज्ञान के आगे नत थे। वर्तमान में पंथ श्री प्रकाशमुनिनाम साहब इस परम्परा के संवाहक आचार्य हैं। पंथ श्री प्रकाशमुनिनाम साहब (दामाखेड़ा) अपने पूर्ववर्ती आचार्यों की ही तरह ‘नाम स्मरण’, ‘शाकाहार के आग्रही और मांसाहार का कड़ा विरोध, ‘मनुष्य निर्माण’, ‘धर्म का मर्म’, ‘सामाजिक कुरीतियों का विरोध’, ‘प्रकृति के साथ विकास’, ‘सत्य धर्म का प्रचार’ आदि अनेक विषयों को प्रवचन के माध्यम से जन सामान्य तक पहुंचाया।

कबीर पंथ का वर्तमान मुख्यालय दामाखेड़ा (रायपुर, छत्तीसगढ़) है, दामाखेड़ा गुरु गद्दी की स्थापना विजयादशमी को हुई थी, विजयादशमी को ही पंथ श्री प्रकाशमुनिनाम साहब का भी प्रागट्य हुआ। अतः दामाखेड़ा में प्रतिवर्ष विजयादशमी को ‘भव्य शोभायात्रा’ निकाली जाती है, जिसमें पंथ श्री रथ पर सवार होकर दर्शन देते हैं। इस शोभायात्रा में देश-विदेश के लोग सम्मिलित होते हैं, विभिन्न राज्य के लोग और जनजाति भजन, गीत और नृत्य करते हैं। इसी प्रकार माघ माह की पूर्णिमा के अवसर पर लगभग एक सप्ताह तक संत समागम समारोह का आयोजन प्रतिवर्ष होता है, जहां दुनियाभर के लाखों लोग सहभागी होते हैं।

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दैनिक भास्कर और पत्रिका जैसे राष्ट्रीय अखबार में बतौर रिपोर्टर सात वर्ष का अनुभव रखने वाले कमलेश वर्मा बिहार से ताल्लुक रखते हैं. बातें करने और लिखने के शौक़ीन कमलेश ने विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन से अपना ग्रेजुएशन और दिल्ली विश्वविद्यालय से मास्टर्स किया है. कमलेश वर्तमान में साऊदी अरब से लौटे हैं। खाड़ी देश से संबंधित मदद के लिए इनसे संपर्क किया जा सकता हैं।

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