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Home - Biography - गुरु गोविंद सिंह का इतिहास PDF
Biography KAMLESH VERMABy KAMLESH VERMA

गुरु गोविंद सिंह का इतिहास PDF

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गुरु गोविंद सिंह का इतिहास PDF
गुरु गोविंद सिंह का इतिहास PDF

भारतीय इतिहास अपने देश में जन्में महापुरुषों के गौरवमयी गाथा से परिपूर्ण है। यहाँ समय-समय पर ऐसे वीरों ने जन्म लिया जिनकी वीरता व साहस को  देखकर शत्रु सेना दंग रह जाती थी। श्री गुरु तेगबहादुर के कालखंड में औरंगजेब के अत्याचार चरम सीमा पर थे। दिल्ली का शासक हिन्दू धर्म तथा संस्कृति को समाप्त कर देना चाहता था। हिन्दुओं पर जजिया कर लगाया गया साथ ही हिन्दुओं को शस्त्र धारण करने पर भी प्रतिबन्ध लगाया गया था। ऐसे समय में कश्मीर प्रांत से पाँच सौ ब्राह्मणों का एक जत्था गुरु तेगबहादुरजी के पास पहुँचा। पंडित कृपाराम इस दल के मुखिया थे।

कश्मीर में हिन्दुओं पर जो अत्याचार हो रहे थे, उनसे मुक्ति पाने के लिए वे गुरुजी की सहानुभूति व मार्गदर्शन प्राप्ति के उद्देश्य से आये थे। गुरु तेगबहादुर उन दु:खीजनों की समस्या सुन चिंतित हुए। सभागार में उपस्थित सभी गंभीर थे। मौन का वातावरण छाया हुआ था। अपने पिता को विचार मग्न देखकर बालक गोविन्दराय (बाद में गुरु गोविन्द सिंहजी) से नहीं रहा गया।

उन्होंने अपने पिता से उनकी गंभीर्यता का कारण पूछा – गुरुजी तेगबहादुरजी ने स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि किसी महापुरुष के बलिदान से ही इनका कष्ट दूर हो सकता है। बालक गोविन्द सिंह ने सहज भाव से कहा, ‘‘पिताजी आप से महान भला और कौन हो सकता है जो इस कार्य को पूर्ण कर सके ?” अपने पुत्र के निर्भीक व स्पष्ट वचनों को सुनकर गुरु तेगबहादुर का हृदय गदगद हो गया। उन्हें इस समस्या का समाधान मिल गया। उन्होंने कश्मीरी पंडितों से कहा-

‘‘आप औरंगजेब को संदेश भिजवा दें कि यदि गुरु तेगबहादुर इस्लाम स्वीकार लेंगे, तो हम सभी इस्लाम स्वीकार कर लेंगे” और फिर दिल्ली में गुरुजी का अमर बलिदान हुआ जो हिन्दू धर्म की रक्षा के महान अध्याय के रूप में भारतीय इतिहास में अंकित हो गया।

ऐसे निर्भीक व तत्परता के गुणों से युक्त श्री गुरु गोविन्द सिंहजी का जन्म संवत् 1723 विक्रमी की पौष सुदी सप्तमी अर्थात 22 दिसम्बर सन् 1666 में हुआ। उनके पिता गुरु तेगबहादुर उस समय अपनी पत्नी गुजरी तथा कुछ शिष्यों के साथ पूर्वी भारत की यात्रा पर थे। अपनी गर्भवती पत्नी और कुछ शिष्यों को पटना छोड़कर वे असम रवाना हो गये थे। वहीं उन्हें पुत्र प्राप्ति का शुभ समाचार मिला। बालक गोविन्द सिंह के जीवन के प्रारंभिक 6 वर्ष पटना में ही बीते।

अपने पिता के बलिदान के समय गुरु गोविन्द सिंह की आयु मात्र 9 वर्ष की थी। इतने कम उम्र में गुरु पद पर आसीन होकर उन्होंने गुरु पद को अपने व्यक्तित्व व कृतित्व से और भी गौरवान्वित किया। उनके जीवन के प्रथम पाँच-छह वर्ष पटना में ही व्यतीत हुए। वे बचपन से ही बहुत पराक्रमी व प्रसन्नचित व्यक्तित्व के धनी थे। उन्हें सिपाहियों का खेल खेलना बहुत पसंद था। उनके मित्र उनकी सेना थी। वे उन्हें दो दलों में बाँट देते थे। उनमें से एक दल के वे स्वयं नेता बन जाते थे, तो दूसरे दल में से किसी को नेता बना देते थे। उनके खेल में साहस, योग्यता और धैर्य का गुण विकसित करने की अद्भुत शक्ति थी।

एक दिन वे शहर में अपने मित्रों के साथ खेल रहे थे तभी पटना के नवाब वहाँ से गुजरे। उनके एक सेवक ने बालकों से नवाब को सलाम करने को कहा। किन्तु गुरु गोविन्द सिंह ने अपने साथियों को ऐसा करने से मना कर दिया और उन पर हँसने की योजना बनाई। जैसे ही नवाब वहाँ पहुँचे वे सभी उनका मजाक उड़ाते हुए हँसते और चिल्लाते वहाँ से भाग गये।

बालक गोविन्द बचपन में ही जितने बुद्धिमान थे उतने ही अपने स्वाभिमान की रक्षा के लिए किसी से भी लोहा लेने में पीछे नहीं हटते थे। वे एक कुशल संगठक थे। दूर-दूर तक फैले हुए सिख समुदाय को ‘हुक्मनामे’ भेजकर, उनसे धन और अस्त्र-शस्त्र का संग्रह उन्होंने किया था। एक छोटी-सी सेना एकत्र की और युद्ध नीति में उन्हें कुशल बनाया। उन्होंने सुदूर प्रदेशों से आये कवियों को अपने यहाँ आश्रय दिया। इस प्रकार गुरु गोविन्द सिंह के महान व्यक्तित्व से सिख पंथ की नवचेतना का जागरण होने लगा था।

यद्यपि बालक गोविन्द सिंह को बचपन में अपने पिता श्री गुरु तेगबहादुरजी से दूर ही रहना पड़ा था, तथापि श्री गुरु तेगबहादुरजी ने उनकी शिक्षा का सुव्यवस्थित प्रबंध किया था। साहेबचंद खत्रीजी से उन्होंने संस्कृत एवं हिन्दी भाषा सीखी और काजी पीर मुहम्मदजी से उन्होंने फारसी भाषा की शिक्षा ली।

कश्मीरी पंडित कृपारामजी ने उन्हें संस्कृत भाषा तथा गुरुमुखी लिपि में लेखन, इतिहास आदि विषयों के ज्ञान के साथ उन्हें तलवार, बंदूक तथा अन्य शस्त्र चलाने व घुड़सवारी की भी शिक्षा दी थी। श्री गोविन्द सिंहजी के हस्ताक्षर अत्यंत सुन्दर थे। वे चित्रकला के भी अच्छे जानकार थे। सिराद, (एक प्रकार का तंतुवाद्य) मृदंग और छोटा तबला बजाने में वे अत्यंत कुशल थे। उनके काव्य में ध्वनि नाद और ताल का सुंदर संगम हुआ है।

विवाह – 

लाहौर के श्री भिकिया (सुभिकीजी) खत्री की कन्या सुश्री जितो के साथ श्री गोविन्द सिंहजी का विवाह सन् 1677 ई. में सम्पन्न हुआ। श्री रामसरणजी की कन्या सुश्री सुन्दरीजी के साथ उनका द्वितीय विवाह 1684 ई. में हुआ।

उनका तीसरा विवाह रोहटास के सिख श्री हर भगवानजी की कन्या सुश्री साहिब दीवान के साथ सम्पन्न हुआ।

श्री गुरु गोविन्द सिंहजी के चार पुत्र थे, बड़े पुत्र अजीत सिंहजी (माता सुन्दरी जी) का जन्म 26 जनवरी, 1687 के दिन हुआ था। जुझार सिंहजी (माता जितोजी) का जन्म 14 मार्च, सन् 1691 ई. में, जोरावर सिंहजी (माता जितोजी) का जन्म 17 नवम्बर, सन् 1696 ई. में और सबसे छोटे पुत्र फतेह सिंह (माता जितोजी) जन्म 25 फरवरी, सन् 1699 ई. में हुआ।

रणजीत नगाड़ा 

श्री गुरु गोविन्द सिंहजी ने एक नगाड़ा बनवाया था और उसका नाम रणजीत नगाड़ा रखा था। यह नगाड़ा प्रात: व सायंकाल बजाया जाता था। श्री गुरु गोविन्द सिंहजी ने धीरे-धीरे सेना एकत्रित करना प्रारंभ कर दिया। उनकी सेना में स्वामी भक्त सिखों के साथ-साथ कुछ लोग धनार्जन के लिए भी सेना में भरती हुए, उन्होंने लाहौर से तीक्ष्ण बाण मंगवाये और धनुर्विद्या का अभ्यास प्रारंभ कर दिया।

इस प्रकार श्री गुरु गोविन्द सिंहजी का बढ़ता हुआ संगठन, पहाड़ी राजाओं में डर पैदा कर रहा था। वे उन पर नियंत्रण रखना चाहते थे। पुन: निम्न कही जाने वाली जातियों को ऊपर उठाने के गुरु गोविन्द सिंह के प्रयासों से, परम्परागत जाति-अभिमानी ये राजा रुष्ट हो गये थे और ऐसी स्थिति में उन्होंने गुरुजी के विरुद्ध मोर्चा खोल दिया।

सिख इतिहास के अनुसार कलिहूर के राजा भीमचन्द (जिसके क्षेत्र में, गुरु गोविन्द सिंह अपने शक्ति केन्द्र आनन्दपुर की स्थापना कर रहे थे।) के पुत्र अजमेरचन्द का विवाह गढ़वाल के राजा फतेशाह की पुत्री से निश्चित हुआ था। गुरु गोविन्द सिंहजी इस समय पांवटा नामक स्थान पर थे। इस विवाह के अवसर पर अनेक पहाड़ी राजा ससैन्य उपस्थित हुए।

योजना थी कि विवाह के बाद गुरु गोविन्द सिंहजी पर आक्रमण किया जाये। गुरुजी को इस योजना की जानकारी जैसे ही हुई, उन्होंने पांवटा से 6 मील के अंतर पर, युद्ध की दृष्टि से उपयुक्त स्थान भंगाणी में मोर्चे बांध लिये। इस युद्ध में गुरु गोविन्द सिंहजी ने स्वयं नेतृत्व किया।

पहाड़ी राजाओं की सेना भाग गई और विजय प्राप्त कर गुरु गोविन्द सिंह आनन्दपुर लौट गये। अप्रैल सन् 1689 में यह गुरुजी के जीवन का प्रथम युद्ध था। इसके बाद उन्होंने लोहगढ़, आनन्दगढ़, केशगढ़ और फतेहगढ़ दुर्ग बनवाये।

पराजित राजाओं ने गुरु गोविन्द सिंह से संधि कर ली और उनका साथ देना स्वीकार किया। उन्होंने औरंगजेब को कर देना रोक दिया। इस पर मुगल सेना ने आक्रमण कर दिया पर गुरु गोविन्द सिंहजी की सहायता से इस आक्रमणकारी सेना को उन्होंने परास्त कर दिया। पर राजाओं ने पुन: कमजोरी दिखाकर, मुगलों से संधि की तैयारी की।

औरंगजेब के निर्देश पर लाहौर के सूबेदार दिलावरखान की सेना उनके पुत्र रुस्तमखान के नेतृत्व में गुरु गोविन्द सिंह पर आक्रमण हेतु बढ़ी। दोनों ओर से युद्ध की तैयारी हुई, पर इसी बीच नदी में भारी बाढ़ आ जाने से, मुगल सेना को परेशान होकर लौटना पड़ा। इसके बाद हुसैन खां नामक सेनापति राजाओं को लूटने लगा। गुरु गोविन्द सिंह की सेना ने हुसैन खां को भी पराजित किया। औरंगजेब इस समय दक्षिण में था। पंजाब के समाचार उसे चिन्तित करने लगे। उसने अपने पुत्र मुअज्जम को भेजा। मुगल सेना ने पहाड़ी राजाओं को बुरी तरह कुचल डाला परंतु आनन्दपुर फिर भी सुरक्षित रहा।

गुरु गोविन्द सिंहजी यह जानते थे कि मुगल सत्ता से संघर्ष टल नहीं सकता। अत: वे अपनी स्थिति दृढ़ करने में लग गये।

भारत में फैली दहशत कमजोर दिली और जनता का हारा हुआ मनोबल देखकर गुरुजी ने कहा – ‘‘मैं एक ऐसे पंथ का सृजन करूँगा जो सारे विश्व में विलक्षण होगा। मैं ऐसे नये पंथ का सृजन करूँगा जिससे कि मेरे शिष्य संसार के हजारों-लाखों लोगों में भी पहली नजर में ही पहचाने जा सकें। जैसे हिरनों के झुंड में शेर और बगुलों के झुंड में हंस। वह केवल बाहर से अलग न दिखे बल्कि आंतरिक रूप में भी ऊँचे और सच्चे विचारों वाला हो।

इस उद्देश्य को ध्यान में रखकर गुरु गोविन्द सिंहजी ने सन् 1699 की बैसाखी वाले दिन जो दृश्य आनंदपुर साहिब की धरती पर दिखाया, उसका अंदाजा कोई भी नहीं लगा सकता था। अपने आदर्शों और सिद्धांतों को अंतिम और सम्पूर्ण स्वरूप देने के लिये गुरुजी ने एक बहुत बड़ा दीवान सजाया। सम्पूर्ण देश से हजारों लोग इकट्ठे हुये। चारों तरफ खुशी का वातावरण था।

gurugobindsinghaskingforaheadऐसी होती है गुरुभक्ति !

बैसाखी का पर्व बड़ी धूमधाम से मनाया जा रहा था। औरंगजेब के अत्याचारों को इस एक दिन के लिए भूलकर लोग खुशी से झूम रहे थे, नाच रहे थे, गा रहे थे। परंतु श्री गुरुगोविन्द सिंह इस पर्व के अवसर को गुरु भक्ति की परीक्षा के सुअवसर के रूप में बदल देना चाहते थे। वे जानते थे कि मुगल सत्ता से संघर्ष किये बिना भारतीय समाज स्वाभिमान से जी नहीं सकता। वे यह भी जानते थे कि शक्ति और भक्ति दोनों ही धर्म की संस्थापना के लिए परमावश्यक हैं। अत: उन्होंने बैसाखी के मेले में एक बड़ा अखाड़ा बनाया, जहाँ पर देश भर से अनेक लोग आए। गुरुगोविन्द सिंह के चेहरे का तेज और उनका प्रभावी व्यक्तित्व आज कुछ महान व्यक्तियों की शोध के लिए बड़ी तेजस्विता से प्रगट हो रहा था। उन्होंने हजारों भक्तों से आह्वान किया कि ‘आज धर्म पर संकट आया है, लाखों लोग मुगलों के अत्याचार से त्रस्त हैं, कौन ऐसा वीर है जो धर्म की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति देने के लिए तत्पर है।’ गुरुगोविन्द सिंह के हाथों में नंगी तलवार देखकर उनके इस प्रश्न से लोग भयभीत हो गए और बहुतों को इस प्रश्न पर आश्चर्य भी हुआ। कुछ सोच रहे थे कि आज गुरुजी क्यों अपने शिष्यों को अपना बलिदान करने का आह्वान कर रहे हैं।

सम्पूर्ण जनसमुदाय स्तब्ध हो गया था। लोग एक दूसरे का मुँह ताक रहे थे। गुरुजी ने पुन: प्रश्न किया कि ‘क्या इस भारतवर्ष में कोई ऐसा वीर नहीं जो धर्म के लिए अपना बलिदान दे सके।’ जब किसी ने उत्तर नहीं दिया। तब उन्होंने कहा, ‘क्या इसी दिन के लिए तुमने जन्म लिया है कि जब महान कार्य के लिए तुम्हारी आवश्यकता पड़े, तो तुम सिर झुकाये खड़े रहो।

कोई है ऐसा भक्त जो धर्म-भक्ति की बलिवेदी पर अपने आप को समर्पित कर दे।’ तभी लाहौर का एक दयाराम खत्री उठा और उसने कहा, ‘‘मैं प्रस्तुत हूँ।” गुरु उसे अपने साथ कक्ष के भीतर ले गए। वहाँ पहले से कुछ बकरे बांधकर रखे गये थे। गुरु ने एक बकरे का सिर काटकर रक्तरंजित तलवार थामे पुन: सभा में प्रवेश किया। पुन: वही सवाल ! ‘एक के बलिदान से कार्य नहीं चलेगा, है कोई और जो धर्म के लिए अपने प्राण दे दे?’  इस बार दिल्ली का एक जाट ‘धर्मदास’ आगे बढ़ा। गुरु उसे भी अन्दर ले गए। पुन: बाहर आकर वही प्रश्न। इस प्रकार तीन और व्यक्ति अंदर ले जाये गये और वे थे द्वारिका का एक धोबी मोहकमचंद, जगन्नाथपुरी का रसोइया हिम्मत और बीदर का नाई साहबचन्द।

pbe065_guru_and_panj_pyareगुरु ने इन पांचों को सुन्दर वस्त्र पहनाये। उन्हें ‘पंज प्यारे’ कहकर सम्बोधित किया। उन पांचों को लेकर वे बाहर आये तो सभा स्तब्ध रह गई। बैठे हुए सभी लज्जित हुए। इन पंज प्यारों में केवल एक खत्री था। शेष चारों उस वर्ग के थे, जिन्हें निचला वर्ग कहा जाता था। गुरु ने उन्हें सर्वप्रथम दीक्षित किया और आश्चर्य – स्वयं भी उनसे दीक्षा ग्रहण की। उन्होंने ‘खालसा’ को ‘गुरु’ का स्थान दिया और ‘गुरु’ को ‘खालसा’ का। गुरु ने उनके साथ बैठकर भोजन किया। उन पांचों को जो अधिकार उन्होंने दिये, उनसे अधिक कोई भी अधिकार अपने लिए नहीं रखे। जो प्रतिज्ञाएं उनसे कराईं, वे स्वयं भी की। इस प्रकार गुरुगोविन्द सिंह ने अपने पूर्व की नौ पीढ़ियों के सिख समुदाय को ‘खालसा’ में परिवर्तित किया। ईश्वर के प्रति निश्चल प्रेम ही सर्वोपरि है, अत: तीर्थ, दान, दया, तप और संयम का गुण जिसमें है, जिसके हृदय में पूर्ण ज्योति का प्रकाश है वह पवित्र व्यक्ति ही ‘खालसा’ है। ऊंच, नीच, जात-पात का भेद नष्ट कर, सबके प्रति उन्होंने समानता की दृष्टि लाने की घोषणा की। उन्होंने सभी को आज्ञा दी कि अपने नाम के साथ ‘सिंह’ शब्द का प्रयोग करें। इसी समय वे स्वयं, गुरुगोविन्द राय से गुरुगोविन्द सिंह बने।

वे पवित्र हैं

गुरु महाराज ने उन पांचों वीरों की ओर इंगित करते हुए कहा कि ये खालिस हैं यानि पवित्र हैं-

जे आरज (आर्य) तू खालिस होवे। 

हँस-हँस शीश धर्म हित खोवे।।

गुरु महाराज ने एक बड़ा कडाह मंगवाया और उसमें पानी, दूध व बताशा मिलाकर उस घोल को अपनी दुधारी तलवार से चलाया और इस अमृत को उन्होंने उन पंज प्यारों को चखाकर सिंह बनाया। फिर स्वयं उन पंज प्यारों के सामने घुटनों के बल बैठकर उन्होंने उनसे प्रार्थना कि वे उन्हें अमृत चखायें। दुनिया के इतिहास में यह बेजोड़ उदाहरण है जब गुरु ने अपने शिष्यों से दीक्षा लेकर सबकी समानता का प्रभावी उद्घोष किया हो। अमृत चखकर वे गोविन्दराय से गोविन्द सिंह बन गये। बाद में गुरु महाराज ने आह्वान किया कि जो-जो धर्म की रक्षा में अपने शीश कटाने को प्रस्तुत हों वे अमृत चखने के लिए आगे आयें और देखते-ही-देखते सिंहों की विशाल वाहिनी खड़ी हो गयी।

उन्होंने पंच ‘क’ – ‘केश’, ‘कड़ा’, ‘कंघा’, ‘कच्छ’ और ‘कृपाल’ – धारण करने का निर्देश प्रत्येक सिख के लिये दिया। ‘समर्पण’, ‘शुचित्व’, ‘दैवभक्ति’, ‘शील’ और ‘शौर्य’ का भाव इसके पीछे था।

‘खालसा’ निर्माण की तीव्र प्रतिक्रिया होनी ही थी। ‘पहुल’ में दीक्षित सिख जब अपने-अपने घरों को लौटे तो इस नये पंथ का प्रचार करने लगे। कहिलूर के राजा बुरी तरह घबरा गये। एक धार्मिक सम्प्रदाय को गुरु गोविन्द सिंह ने पूर्णत: राजनीतिक बना दिया था। कहिलूर के राजा ने एक पत्र लिखकर गुरुजी से कहा कि वे आनन्दपुर छोड़कर कहीं और चले जायें। पर उन्होंने साफ शब्दों में इंकार कर दिया।

पहाड़ी राजा पुन: एकत्र हुए। बीस हजार की सेना को लेकर उन्होंने आक्रमण कर दिया। गुरु गोविन्द सिंहजी के पास केवल आठ हजार सैनिक थे। पर खालसा सेना विजयी हुई।

इधर पहाड़ी राजाओं की बेचैनी बढ़ रही थी। वे कभी गुरु से सुलह करते, तो मौका देखकर आक्रमण भी करते। परंतु प्रत्येक युद्ध में वे पराजित ही होते रहे।

पहाड़ी राजाओं और अपने नामी सरदारों की पराजय से औरंगजेब बहुत चिंतित हो उठा। उसने एक विशाल सेना भेजी। इस सेना में सरहिंद, लाहौर और जम्मू के सूबेदारों की सेनाएं भी सम्मिलित हुईं। 22 पहाड़ी राजा भी अपनी सेना के साथ उसमें आ मिले। गुरु गोविंद सिंहजी अपनी शक्ति के अनुसार तैयारी कर चुके थे। प्रारंभिक झड़पों में मुगल सैनिक और पहाड़ी राजा खालसा सेना के आगे टिक नहीं पाये। पर शीघ्र ही उस विशाल मुगल सेना ने आनंदपुर के चारों और कड़ा घेरा डाल दिया।

आनंदपुर का बाहर से संबंध टूट गया। अनाज और पानी की भारी कमी होने लगी। भूख-प्यास से सैनिक तड़पने लगे। मुगल सेनापति कुरान और पहाड़ी राजा गीता की सौगंध के साथ सन्देश भेजने लगे कि दुर्ग छोड़ दें तो उन्हें सुरक्षित जाने दिया जायेगा। सैनिक आग्रह करने लगे तो गुरुजी ने कहा, वे जा सकते हैं परंतु लिखकर दे दें कि गुरु-शिष्य का सम्बन्ध तोड़ रहे हैं। 40 सिखों ने यह ‘बे-दावा’ लिख दिया और दुर्ग छोड़कर चले गये। बाद में सिखों से सलाह कर दुर्ग का घेरा छोड़ गुरु गोविन्द सिंह अपनी माता, पत्नियों और चारों पुत्रों अजीत सिंह, जुझार सिंह, जोरावर सिंह और फतेह सिंह तथा बचे हुए साथियों के साथ निकल गये।

यह काल रात्रि 

imagesइस बात का पता चलते ही शत्रु सेना उन पर टूट पड़ी। सरसा नदी के तट पर वर्षा और शीत में ही युद्ध छिड़ गया। अजीत सिंह (19 वर्ष) और जुझार सिंह (14 वर्ष) सहित 40 सिखों को लेकर गुरु गोविन्द सिंहजी चमकौर की गढ़ी तक पहुंच गये, परंतु परिवार के शेष लोग बिछड़ गये। उनके दोनों छोटे पुत्र जोरावर सिंह और फतेह सिंह दादी गुजरी सहित किसी भांति उनके पुराने रसोईये गंगाराम के गांव पहुंचे। पर गंगाराम ने विश्वासघात कर बच्चों को सर हिंद के सूबेदार वजीर खान को सौंप दिया। वजीर खान ने उन्हें जीवित दीवार (27 दिसंबर, 1704)  में चुनवा दिया। माता गुजरी यह दु:ख सहन नहीं कर सकीं और उन्होंने प्राण त्याग दिये। औरंगजेब की मृत्यु के बाद उसके पुत्र गद्दी के लिये लड़ पड़े। इसी संघर्ष में शहजादा मुअज्जम गुरु का आशीर्वाद पाने के लिये उनके पास पहुंचा। बाद में मुअज्जम बहादुरशाह के नाम से दिल्ली की गद्दी पर बैठा। बहादुरशाह गुरुजी को ‘दरवेश’ (संत) के रूप में देखता था वे एक मित्र के रूप में उसकी सेना के साथ दक्षिण गये। बहादुरशाह की सेना कामबख्श (बहादुरशाह के भाई) के विद्रोह को दबाने के लिए आगे बढ़ी, परंतु गुरुजी गोदावरी के किनारे नांदेड़ में रुक गये।

बन्दा बैरागी

जब गुरुजी की भेंट उज्जैन में दाऊदपंथी गुरु नारायणदास से हुई, तब उन्होंने बताया कि नांदेड़ में एक बैरागी महन्त हैं जो अद्वितीय हैं। यह पुरुष देखने योग्य है।

उसी बैरागी माधोदास से गुरु गोविन्द सिंह की भेंट नांदेड़ में हुई। वे उसके डेरे पर गये। माधोदास उस समय डेरे में नहीं थे। गुरुजी उसकी गद्दी पर बैठ गये। कहते हैं, गुरु को अपनी गद्दी से उतारने के लिये माधोदास ने मंत्रशक्ति का प्रयोग किया फिर भी सफलता नहीं मिली।

अंत में वह गुरु के पास जाकर बोला,

माधोदास : आप कौन हैं ?

गुरु गोविन्द सिंहजी : वही जिसे तुम जानते हो।

माधोदास : मैं क्या जानता हूँ ?

गुरु गोविन्द सिंहजी : मैं तुम्हें अपना शिष्य बनाने आया हूँ।

माधोदास : र्मै मानता हूँ। मैं आपका बंदा हूँ।

ऐसा कहकर वह गुरु के चरणों में गिर पड़ा और गुरुजी ने उसे सिख धर्म की दीक्षा दी एवं अमृत प्रदान कर उसे बंदा सिंह नाम दिया।

सिख इतिहास में वह बंदा बहादुर के नाम से जाना जाता है। बाद में गुरुजी ने उसे खालसा का नेतृत्व करने पंजाब भेज दिया।

सर हिंद का नवाब वजीर खान गुरुजी और बादशाह बहादुरशाह की बढ़ती हुई मित्रता से चिंतित था। गुरुजी ने वजीर खान को सबक सिखाने के लिए ही बहादुरशाह की सहायता की थी। क्योंकि वजीर खान ने गुरु के पुत्रों की हत्या की थी। बहादुर शाह ने वजीर खान के नाम एक फरमान जारी किया कि वह प्रतिदिन तीन सौ रुपये गुरुजी को दे।

वजीर खान को गुरु से अत्यंत ईर्ष्या और भय था, अत: उसने उन्हें मारने का प्रण किया। इसके लिए उसने दो पठानों को किराए पर दक्षिण में गुरुजी को मारने भेजा। वे नाँदेड़ पहुँचे और समय-समय पर गुरुजी से मिलते रहे। इस प्रकार वे गुरुजी और उनके शिष्यों के विश्वासपात्र बन गए। एक दिन उनमें से एक गुरु के विस्तार के पास जाकर बैठ गया। गुरु ने उसे प्रसाद दिया और वे सो गए।

कुछ समय बाद गुरुजी का सेवक भी सो गया। तब पठान ने मौका पाकर गुरुजी की बायीं ओर तलवार से वार किया जब तक वह दूसरा वार कर पाता गुरुजी ने अपनी तलवार से उसका सिर काट डाला। फिर गुरुजी ने अपने सिखों को बुलाया। उन्होंने उस पठान के साथी को पकड़कर मार डाला। गुरुजी के घाव कुछ दिनों की दवा-मरहम से धीरे-धीरे ठीक हो गए। किन्तु एक दिन जब वे एक धनुष की प्रत्यंचा चढ़ाने का प्रयास कर रहे थे, उनका घाव फट गया और बहुत खून बहने लगा।

गुरुजी समझ गए कि उनका अंत निकट है। चमकौर साहिब में उन्होंने गुरु पद खालसा को प्रदान कर दिया था। वही धार्मिक कार्यों की देखभाल करेंगे। उनके बाद कोई व्यक्ति विशेष गुरु नहीं होगा। उन्होंने पवित्र ग्रंथ के सामने पाँच पैसे और नारियल रखा और उसके तीन चक्कर लगाकर प्रणाम किया।

फिर उन्होंने सिखों को विदाई संदेश दिया। वे बोले- “किसी व्यक्ति विशेष को मेरे बाद गुरु नहीं बनाया जाएगा – ऐसा पिताजी का आदेश था। गुरु ग्रंथ साहिब के अनुसार पंथ मार्गदर्शन की आवश्यकता हो, तो गुरु ग्रंथ साहिब के पास एकत्र होकर सच्चे और पवित्र मन से मुझे याद करना। पंथ की सेवा और प्रेम करना। खालसा वस्त्रों, सिद्धातों और खालसा की पहचान की रक्षा करना।”

इसके बाद वे परलोक सिधार गए। यह 7 अक्टूबर, 1708 का दिन था।

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दैनिक भास्कर और पत्रिका जैसे राष्ट्रीय अखबार में बतौर रिपोर्टर सात वर्ष का अनुभव रखने वाले कमलेश वर्मा बिहार से ताल्लुक रखते हैं. बातें करने और लिखने के शौक़ीन कमलेश ने विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन से अपना ग्रेजुएशन और दिल्ली विश्वविद्यालय से मास्टर्स किया है. कमलेश वर्तमान में साऊदी अरब से लौटे हैं। खाड़ी देश से संबंधित मदद के लिए इनसे संपर्क किया जा सकता हैं।

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