एक दिन का बादशाह:- स्वागत है दोस्तों lotpot.com पर! आज हम अपने नन्हे पाठकों के लिए एक ऐसी jungle story लेकर आए हैं जो मज़ेदार है। क्या आपने कभी सोचा है कि अगर जंगल के सबसे शरारती और हुड़दंगी बंदर को पूरे जंगल का राजा बना दिया जाए, तो क्या होगा? आज की यह हास्य और सीख वाली कहानी आपको सुंदरवन के एक ऐसे ही अनोखे दिन पर ले जाएगी जहाँ मोंटी बंदर राजा की कुर्सी पर बैठकर पूरे जंगल में गदर मचा देगा। बेहतरीन हिंदी कहानियों के लिए lotpot.com पर हमेशा बने रहें!
एक दिन का बादशाह: जब मोंटी बंदर ने चलाई जंगल की सरकार!
एक दिन का बादशाह बनने का मौका सुंदरवन के सबसे नटखट मोंटी बंदर को तब मिला, जब राजा शेर सिंह एक बहुत ही अजीब बीमारी से परेशान हो गए। राजा लगातार राज-काज संभालने और जानवरों की छोटी-छोटी शिकायतें सुनने की वजह से उनका सिर दर्द से फटने लगा था।
डॉक्टर उल्लू जी ने राजा को सलाह दी, “महाराज! आपको तुरंत एक दिन के आराम की ज़रूरत है। आप किसी और को एक दिन के लिए राज-काज सौंप दीजिए।” राजा ने सोचा कि क्यों न जंगल के सबसे शिकायत करने वाले जीव मोंटी बंदर को ही राजा बना दिया जाए, ताकि उसे समझ आए कि राज चलाना कितना मुश्किल है। मोंटी बंदर दिन भर पेड़ की डालियों पर उल्टा लटकता रहता था। जैसे ही राजा ने मोंटी को बुलाया और उसके सिर पर अपना भारी सोने का मुकुट रखा, मोंटी खुशी से उछल पड़ा और चिल्लाया, “वाह! आज से मैं हूँ इस सुंदरवन का एक दिन का बादशाह!”
मोंटी के मज़ेदार शाही फरमान
राजा की गद्दी पर बैठते ही मोंटी बंदर के अंदर का शरारती दिमाग जाग गया। उसने तुरंत अपनी लाल टाई को थोड़ा ढीला किया और दरबार में अपना पहला शाही फरमान सुनाया।
मोंटी ने ज़ोर से कहा, “सुनो-सुनो पूरे सुंदरवन के वासियों! आज से जंगल का कोई भी जानवर सुबह जल्दी उठकर कोई काम नहीं करेगा। सब दोपहर बारह बजे तक आराम से सोएँगे!” यह सुनकर आलसी मोंटी भालू (जो हमेशा पीले ओवरऑल में रहता था) ने खुश होकर ताली बजाई, लेकिन सुबह-सुबह उठकर योग करने वाले चीकू खरगोश का मुँह लटक गया।
मोंटी यहीं नहीं रुका! उसने दूसरा कानून बनाया, “आज से पूरे जंगल में कोई भी हरी घास, पत्तियां या सूखी रोटी नहीं खाएगा। आज दोपहर के शाही भोज में सबको सिर्फ और सिर्फ पके हुए मीठे केले और शहद के पकोड़े परोसे जाएँगे!” अब शाकाहारी हिरण और जिराफ़ परेशान हो गए कि वे दिन भर मीठे केले कैसे खाएँगे!
जब मोंटी के दरबार में मची असली खलबली
दोपहर होते-होते मोंटी बंदर को समझ आने लगा कि गद्दी पर बैठना सिर्फ केले खाना नहीं है। तभी दरबार में चीकू खरगोश दौड़ता हुआ आया, जिसने हरी जैकेट पहन रखी थी।
चीकू ने शिकायत की, “महाराज! मोंटी भालू ने मेरे घर के सामने अपना कीचड़ का टब रख दिया है, जिससे मुझे निकलने में दिक्कत हो रही है।”
मोंटी बंदर ने मुकुट को सीधा करते हुए कहा, “अरे, तो तुम भालू के टब में से कूदकर निकल जाया करो! अगला केस लाओ!”
तभी वहाँ हाथी दादा आए, जिन्होंने धारीदार स्वेटर पहना था। वे बहुत गुस्से में थे, “महाराज! चिंटू चूहे ने मेरे गद्देदार सोफे के अंदर घुसकर सारा रूई कुतर दिया है।”
मोंटी ने सिर खुजाते हुए कहा, “तो हाथी दादा, आप चूहे के बिल में जाकर सो जाइए! बात बराबर!”
मोंटी के ऐसे पागलों जैसे फैसले सुनकर पूरे दरबार में जानवर आपस में लड़ने लगे। बंदरों ने तो राजा के महल के पर्दों पर लटकना शुरू कर दिया, भालू ने सारा शहद फर्श पर गिरा दिया, और चारों तरफ भयंकर शोर मच गया। मोंटी बंदर चिल्लाता रहा, “शांत हो जाओ! मैं राजा हूँ!” लेकिन कोई उसकी बात सुनने को तैयार नहीं था। मुकुट उसके सिर से फिसलकर उसकी आँखों पर आ गिरा और वह अपनी ही गद्दी से नीचे लुढ़क गया।
शाम का न्याय और कहानी की सीख
शाम होते-होते मोंटी बंदर पूरी तरह थक चुका था। उसका सिर दर्द से फटा जा रहा था और उसकी सुंदर डंगरी पर केले का छिलका चिपका हुआ था। ठीक उसी समय राजा शेर सिंह मुस्कुराते हुए दरबार में वापस आए।
मोंटी ने तुरंत मुकुट उतारा और राजा के पैरों में रखते हुए बोला, “महाराज! मुझे माफ़ कर दीजिए। यह एक दिन का बादशाह बनना मेरे बस की बात नहीं है। राजा बनना सिर्फ हुक्म चलाना नहीं है, बल्कि सबकी समस्याओं को समझदारी से सुलझाना है। मैं तो पेड़ पर उल्टा लटककर केले खाने में ही खुश हूँ!” राजा शेर सिंह और पूरे जंगल के जानवर मोंटी की हालत देखकर ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगे।
कहानी की सीख: इस मज़ेदार नैतिक कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि दूर से दूसरों का काम या उनकी कुर्सी बहुत आसान और ऐशो-आराम वाली लगती है, लेकिन जब हम खुद उस ज़िम्मेदारी को संभालते हैं, तब हमें उसकी असली कठिनाई का अहसास होता है। हमें दूसरों की ज़िम्मेदारियों का सम्मान करना चाहिए और अपनी क्षमता के अनुसार ही काम करना चाहिए।
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