एमएसपी क्या है, किसान सरकार के नए कानूनों का विरोध क्यों कर रहे हैं?

 एमएसपी क्या है, किसान सरकार के नए कानूनों का विरोध क्यों कर रहे हैं?

केंद्र सरकार एग्रीकल्चर क्षेत्र में सुधार के लिए तीन विधेयक लाई है। विधेयकों को सरकार लोकसभा पारित कर चुकी है। पंजाब और हरियाणा सहित कुछ राज्यों में विधेयक से किसान नाराज हैं। किसानों को उपज की न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की चिंता है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर स्पष्ट कर चुके है कि एमएसपी खत्म नहीं होगा। विपक्षी पार्टियों पर किसानों को गुमराह करने का आरोप लगा रहे हैं। एनडीए की घटक पार्टी शिरोमणि अकाली दल भी एमएसपी को लेकर सराकर से नाराज है। हरसिमरत कौर बादल ने तो केंद्रीय कैबिनेट से इस्तीफा तक दे दिया है।

क्या है एमएसपी या मिनिमम सपोर्ट प्राइज?

  • एमएसपी न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी गारंटेड कीमत है जो किसानों को उनकी उपज पर मिलता है। फिर चाहे बाजार में उस उपज की कीमतें कम हो। बाजार में उपज की कीमतों में होने वाले उतार-चढ़ाव का किसानों पर असर न पड़े। इसलिए किसानों को उपज की न्यूनतम कीमत मिलती रहे।
  • सरकार हर सीजन से पहले सीएसीपी यानी कमीशन फॉर एग्रीकल्चर कॉस्ट एंड प्राइजेस की सिफारिश पर एमएसपी तय करती है। फसल की आवक ज्याद होती है तो बाजार में कीमतें कम होती है, तब एमएसपी किसानों के लिए फिक्स एश्योर्ड कीमत का काम करती है। किसानों को बचाने वाली बीमा पॉलिसी की तरह काम करती है।

इसकी जरूरत क्यों है और यह कब लागू हुई?

  • 1950 और 1960 के दशक में किसानों के समक्ष परेशानी थी कि यदि किसी फसल का बम्पर उत्पादन होता था, तो उन्हें  उचित दाम नहीं मिल पाता था। जिसके कारण किसान आंदोलन कर सड़कों पर उतरने लगे। हालत यह थे कि उपज की लागत तक नहीं निकल पाती थी। ऐसे में फूड मैनेजमेंट एक बड़ा संकट बन गया था। सरकार का कीमतों पर कंट्रोल नहीं था।
  • 1964 में एलके झा की अगुवाई में फूड-ग्रेन्स प्राइज कमेटी गठित की गई। जिनके सुझावों पर ही 1965 में भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) की स्थापना हुई और एग्रीकल्चरल प्राइजेस कमीशन (एपीसी) बनाया गया।
  • दोनों संस्था देश में खाद्य सुरक्षा का प्रशासन करने में मदद करती है। एफसीआई वह एजेंसी है जो एमएसपी पर अनाज खरीदती है। उसे अपने गोदामों में स्टोर करती है। पब्लिक डिस्ट्रिब्यूशन सिस्टम (पीडीएस) के जरिये जनता तक अनाज को रियायती दरों पर पहुंचाती है।
  • देशभर में करीब पांच लाख शासकीय उचित मूल्य दुकानें हैं जहां से बीपीएल पात्रों को रियायती दरों पर अनाज बांटा जाता है। एपीसी का नाम 1985 में बदलकर सीएपीसी किया गया।

एमएसपी का किसानों को किस तरह लाभ हो रहा है?

  • खाद्य और सार्वजनिक वितरण मामलों के राज्यमंत्री रावसाहब दानवे पाटिल ने 18 सितंबर को राज्यसभा में जानकारी दी कि 9 सितंबर की स्थिति में रबी सीजन में गेहूं पर एमएसपी का लाभ लेने वाले 43.33 लाख किसान थे, यह पिछले साल के 35.57 लाख से करीब 22 प्रतिशत ज्यादा थे।
  • 2016-17 में सरकार को एमएसपी पर गेहूं बेचने वाले किसानों की संख्या 20.46 लाख थी। अब इन किसानों की संख्या 112% ज्यादा है।
  • रबी सीजन में सरकार को गेहूं बेचने वाले किसानों में मध्यप्रदेश (15.93 लाख) सबसे आगे था। पंजाब (10.49 लाख), हरियाणा (7.80 लाख), उत्तरप्रदेश (6.63 लाख) और राजस्थान (2.19 लाख) इसके बाद थे। यह हैरानी वाली बात है कि कृषि कानूनों को लेकर मध्यप्रदेश में कोई आंदोलन नहीं हुआ। और तो और, कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर भी मध्यप्रदेश से ही ताल्लुक रखते हैं।
  • खरीफ सीजन में एमएसपी पर धान बेचने वाले किसानों की संख्या 2018-19 के 96.93 लाख के मुकाबले बढ़कर 1.24 करोड़ हो गई यानी 28 प्रतिशत ज्यादा। खरीफ सीजन 2020-21 के लिए अब तक खरीद शुरू नहीं हुई है। 2015-16 के मुकाबले यह बढ़ोतरी 70% से ज्यादा है।

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KAMLESH VERMA

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