सावन सोमवार की व्रत कथा हिंदी में । Sawan Somvar Vrat Katha in Hindi

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वर्ष 2021 में सावन के माह की शुरुआत 25 जुलाई 2021 रविवार से हो रही है, जिसके बाद 26 जुलाई 2021 को इस सावन का पहला सोमवार व्रत औरर 22 अगस्त 2021, रविवार को रक्षाबंधन के दिन सावन माह का समापन होगा. श्रावण माह की समाप्ति के साथ ही भाद्रपद्र माह की शुरुआत हो जाएगी.

सावन माह की शुरुआत रविवार से और सावन का समापन रविवार को ही होगा, जिसमें कुल 4 सोमवार होंगे. पहला सोमवार 26 जुलाई 2021, दूसरा सोमवार 2 अगस्त 2021, तीसरा सोमवार 9 अगस्त 2021 और चौथा सोमवार 16 अगस्त 2021 को होगा. चलिए अब इस पोस्ट में हम आपको सावन सोमवार की कथा (Sawan Somvar Vrat Katha) के बारे में बताएँगे, जिसे पढ़कर आप भगवान शिव यानि भोलेनाथ को प्रसन्न कर सकते है.

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सावन सोमवार व्रत कथा- Sawan Somvar Vrat Katha in Hindi

यदि आप भी भगवान शिव के उपासक हैं और भगवान शंकर की कृपा पाने के लिए सावन के सोमवार का व्रत करते है तो इस कथा (Sawan Somvar Vrat Katha in Hindi) से भोलेनाथ को प्रसन्न कर सकते है-

अमरपुर नगर में एक धनी व्यापारी रहता था, जिसके पास धन-धान्य की कोई कमी नहीं थी और समाज में लोग उसका सम्मान भी करते थे. परेशानी की बात यह है कि, वह बहुत दुखी रहता था. जिसका कारण है कि, उसकी कोई संतान नहीं थी.

व्यापारी इस बात को लेकर अक्सर परेशान रहता कि उसकी कोई संतान नहीं है, जिस वजह से उसके जाने के बाद उसकी संपत्ति का ध्यान कौन रखेगा. वह व्यापारी शिव भक्त था और हर सोमवार को नियम से भगवान शंकर की व्रत-पूजा करता था और शाम को मंदिर में दीया जलाता था.

उस व्यापारी की भक्ति देखकर एक दिन पार्वती ने भगवान शिव से कहा- ‘हे प्राणनाथ, यह व्यापारी आपका सच्चा भक्त है. कितने दिनों से यह सोमवार का व्रत और पूजा नियमित कर रहा है. भगवान, आप इस व्यापारी की मनोकामना अवश्य पूर्ण करें.

भगवान शिव ने कहा कि मनुष्य को उसके कर्मों के अनुसार ही फल की प्राप्ति होती है. लेकिन माता पार्वती जी नहीं मानी और कहने लगीं कि आपको अपने इस भक्त की इच्छा जरूर पूरी करनी चाहिए. भगवान शंकर ने पार्वती जी बात मान ली और कहा कि मैं इस व्यापारी को पुत्र-प्राप्ति का वरदान देता हूं. लेकिन इसका पुत्र 16 वर्ष से अधिक जीवित नहीं रहेगा.

उसी रात भगवान शिव ने स्वप्न में उस व्यापारी को दर्शन देकर उसे पुत्र-प्राप्ति का वरदान दिया और उसके पुत्र के 16 वर्ष तक जीवित रहने की बात भी बताई.

भगवान के वरदान से व्यापारी को खुशी तो हुई, लेकिन पुत्र की अल्पायु की चिंता ने उस खुशी को नष्ट कर दिया. व्यापारी पहले की तरह सोमवार का विधिवत व्रत करता रहा. कुछ माह के बाद  उसके घर अति सुंदर पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई. पुत्र जन्म होने पर व्यापारी के घर में खुशियां भर गईं. बहुत धूमधाम से पुत्र-जन्म का समारोह मनाया गया.

हालांकि व्यापारी को पुत्र-जन्म की अधिक खुशी नहीं हुई, क्योंकि उसे पुत्र की अल्प आयु के रहस्य का पता था. यह रहस्य घर में किसी को मालूम नहीं था. व्यापारी के पुत्र का नाम अमर रखा गया.

अमर के 12 साल के होने पर व्यापारी ने उसे अपने मामा के साथ शिक्षा प्राप्त करने के लिए काशी भेज दिया. मामा और अमर वाराणसी के लिए निकल पड़े. अमर और मामा जी जहां, जहां पहुंचे उन्होंने गरीबों का दान दिया. चलते-चलते वे एक नगर में पहुंच गए. नगर की राजकुमारी का विवाह समारोह हो रहा था.

दूल्हा एक आंख से काना था. लेकिन इस बात की जानकारी राजकुमारी और उनके परिवार को नहीं थी. दूल्हे के माता-पिता ने यह राज छुपा रखा था.

दूल्हे के माता-पिता को यह डर था कि अगर उनका बेटा राजकुमारी के सामने आया तो उनकी पोल खुल जाएगी और शादी टूट जाएगी. इसलिए उन्होंने अमर को कहा कि वह नकली दूल्हा बन जाए. अमर ने आग्रह मान लिया और दूल्हा बन गया. अमर की राजकुमारी से शादी हो गई.

अमर राजकुमारी से यह सच्चाई छुपाना नहीं चाहता था, इसलिए उसने राजकुमारी की चुनरी पर सारी सच्चाई लिख दी. राजकुमारी वह खत पढ़कर हैरान रह गई. अब वह उस काने राजकुमार के साथ जाने को तैयार नहीं थी. राजकुमारी ने अमर से कहा कि वह उन्हीं की पत्नी है और शिक्षा पूर्ण कर वापस आने तक वह यहीं इंतजार करेगी.

मामा जी और अमर काशी चले गए. समय पंख लगाकर आगे बढ़ता रहा. अमर 12 साल का हो गया था और शिवलिंग पर बेल पत्तियां चढ़ा रहा था. तभी यमराज उसके सामने आकर खड़े हो गए. लेकिन इससे पहले ही भगवान शंकर अमर की भक्ति और नेक कार्यों से प्रसन्न होकर उसे दीर्घायु का वरदान दे चुके थे. यमराज को खाली हाथ ही वापस लौटना पड़ा. काशी में अपनी शिक्षा प्राप्त करने के बाद अमर अपनी पत्नी को लेकर घर लौट गया और सपरिवार खुशी-खुशी रहने लगा.

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