बिहार के लिए अभिशाप बनी कोसी नदी, बिहार के बाढ़ प्रभावित गांवों से ग्राउंड रिपोर्ट

 बिहार के लिए अभिशाप बनी कोसी नदी, बिहार के बाढ़ प्रभावित गांवों से ग्राउंड रिपोर्ट

बाढ़ के पानी से सड़कें बीच में से इस तरह से टूट चुकी हैं।

सहरसा/ सुपौल. कोसी नदी उफान पर है. बिहार के लिए अभिशाप बन रही है. बाढ़ के पानी से चहुं ओर सफेद धरती नजर आ रही है. मधुबनी से सुपौल के रास्ते में लोग त्राही-त्राही कर रहे है. घर पानी में डूब जाने से लोग सड़क पर आ गए है. खेतों में लहलहाती धान की फसल पानी में समा गई है. लोग नाव का सहारा लेकर एक स्थान से दूसरे स्थान पर जा रहे है. विड़बना यह है कि, ऐसे में यदि कोई बीमार हो जाए, अस्पताल जाने तक का कोई साधन नहीं है. सहरसा से सुपौल के सफर की ग्राउंड रिपोर्ट…………..

सहरसा सुपौल हाइवे किनारे खड़ी 60 साल की पानो देवी बताती है कि, 20 दिनों से घर पानी में डूबा है. सामने मौजूद खेत में डूबा हुआ घर मेरा है. चाहकर भी घर की दहलीज में कदम नहीं रख सकती है. पानो बताती है कि, बेटे ने किसी से उधार रुपए लेकर नाव खरीदी है.

जिसका उपयोग कर घर में बची राहत सामग्री को सड़क पर लाकर उपयोग करते है. हर साल बारिश में घर डूब जाता है.घर में कुछ नहीं बचा है, कुछ कपड़ों और जरूरी कागजात को घर में रेंगनी बनाकर टांग रखा है. बिहार के सुपौल, सहरसा, कटिहार, मधुबनी जिलों के 70 फीसदी गांव बाढ़ की चपेट में है.

सहरसा जिले के अरापट्टी पंचायत में नदी को छू रहा है, जिससे कच्चा पुल टूट गया है. लोग नाव का सहारा लेने को मजबूर है. सरकार की ओर से किसी प्रकार की कोई मदद नहीं की जा रही है. कुछ लोग 10 रुपए से लेकर 100 रुपए किराया वसूल कर लोगों को नाव का सफर करवा रहे हैं.

जिले के भिलाई गांव के लोग मंदिरों में रहने को मजबूर है. गांव के राहुल रजक ने बताया कि, मंदिरों में वह लोग ठहरे है, जिनके घरों में करीब 20 दिन से बारिश का पानी जमा है. परेशानी यह है कि, बारिश के पानी की उचित निकासी नहीं है. डर यह है कि, जैसे-जैसे कोसी अपने रौद्र रुप में आएगी, वैसे-वैसे लोगों के घर बाढ़ की चपेट में आएंगे.

अरापट्टी गांव के कृष्ण देव सिंह बताते है कि, बारिश तेज होते ही घरों तक पानी पहुंचने लगता है. बाढ़ के बढ़ते खतरे को देख लोग हाईवे के किनारे जाकर रहने लगे है. ग्रामीणों की किस्मत तो देखिए हर साल बाढ़ में यही हालत होते है, लेकिन प्रशासन के कान पर जूं तक नहीं रेंगती.

कोसी नदी पर 36 सालों से रिसर्च कर रहे इंजीनियर दिनेश कुमार मिश्र का तर्क है कि, साल 1950 से 1963 के मध्स कोसी के दोनों तरफ तटबंध बनाए गए थे. उद्देश्य बाढ़ के पानी को फैलने से रोकना था.तटबंध पश्चिम में 126 किमी और पूर्व में 125 किमी तक बनाए गए है. शासकीय दस्तावेज में तटबंधों के अंदर 304 गांव शामिल है. वास्तविकता में 380 शामिल है.

तटबंध निर्माण के दौरान तत्कालीन पीएम जवाहरलाल नेहरू और राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद बिहार निरिक्षण के लिए पहुंचे थे. निर्माण के दौरान ग्रामीणों से सरकार ने वादा किया था कि, जो भी तटबंध के दायरे में आएगा, उनका पुनर्वास किया जाएगा, नौकरी दी जाएगी, खेती के लिए भूमि उपलब्ध करवाया जाएगा.

वादे महज कागजों में सीमट के रह गए.कोसी की धाराएं हर साल बदलती है. 60 पीछे से देखे है, तो यह 160 किमी घूम गई और सहरसा, दरभंगा तक पहुंच चुकी है. तटबंधों के बीच में 1 लाख 20 हजार हेक्टेयर भूमी है. इतिहास की ओर नजर डाले तो साल 1963, 1968, 1971, 1980, 1984, 1987 और 2008 में तटबंध टूटने से दुर्घटनांए हो चुकी है.

कोसी में बाढ़ आने से सहरसा, मधुबनी, सुपौल जिले प्रभावित होते है, जिसके बाद खगड़िया और कटिहार का नंबर लगता है. दस्तावेजों को खंगाले तो कोसी नदी हिमालय से निकलकर नेपाल से होते हुए भारत में प्रवेश करती है. कुछ हिस्सा तिब्बत में पड़ता है.अधिकांश हिस्सा नेपाल के क्षेत्राधिकार में है.

भारत में कैचमेंट एरिया 14 हजार किमी का है. बाढ़ की स्थिति होने पर नेपाल ने पानी छोड़ा है, इसलिए बिहार डूबने लगा है. यह स्टेटमेंट बिहार सरकार का मुख्य बयान है. सोचने वाली बात यह है कि, नेपाल ऊंचाई पर है और बिहार नीचले इलाके में है.

पानी अपनी दिशा स्वयं तय करता है. दैनिक भास्कर डॉट कॉम के अनुसार बिहार में 73 लाख हेक्टेयर जमीन बाढ़ प्रभावित है. कोसी नवनिर्माण मंच अध्यक्ष इंद्रनारायण सिंह के अनुसार, सरकार ने कोसी को काबू करने के लिए दोनों प्रकार के तटबंध बनाए है. लेकिन नदी का दायरा बढ़ने से विनाश की स्थिति उत्पन्न हो रही है.
सरकार ने कोसी विकास प्राधिकार बनाया है, आपदा में जो इंतजाम मिलना चाहिए व लोगों तक नहीं पहुंच पा रहे हैं.

KAMLESH VERMA

https://newsmug.in

Related post