कब है देवी सती को समर्पित कोकिला व्रत – Kokila Vrat 2021

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हिंदू पंचांग के अनुसार, हर साल आषाढ़ मास की पूर्णिमा पर कोकिला व्रत का पर्व मनाया जाता है. यह व्रत हिंदू विवाहिता महिलाओं और कुंवारी कन्याओं के लिए बेहद अनुकूल माना गया है. कोकिला व्रत 23 जुलाई 2021, शुक्रवार के दिन रखा जाएगा. यह व्रत दक्षिण भारत में प्रमुखता से किया जाता है. खास बात यह है कि,  इस व्रत को करने से सुंदरता भी बढ़ती है क्‍योंकि इस व्रत में इंसान को विशेष जड़ी बूटियों से नहाना होता है. यह नियम से आठ दिन तक करती हैं. अलसुबह उठकर भगवान सूर्य देव की पूजा करने का विधान है. कोकिला व्रत देवी सती और भगवान शिव को समर्पित है. कोकिल नाम भारतीय पक्षी कोयल के नाम से संदर्भित है और देवी सती से जुड़ा हुआ है. पोस्ट के जरिए जानते हैं कब है देवी सती को समर्पित कोकिला व्रत – Kokila Vrat 2021

तिथि और मुहूर्त :

  • कोकिला व्रत तिथि: – 23 जुलाई 2021, शुक्रवार
  • कोकिला व्रत पूजा मुहूर्त: – शाम 07:17 से 09:22 तक
  • पूर्णिमा तिथि प्रारंभ: – 23 जुलाई 2021 सुबह 10:43
  • पूर्णिमा तिथि समापन: – 24 जुलाई 2021 सुबह 08:06

कोकिला व्रत पूजन विधि :

  • इस दिन जिस किसी भी इंसान को व्रत रखना हो उसे ब्रह्मा मुहूर्त में उठकर अपने दैनिक कार्यों से को पूरा करके स्नान करना चाहिए.
  • जिसके बाद मंदिर में भगवान शिव, माता पार्वती की प्रतिमा को स्थापित करके उनकी पूजा-अर्चना करनी चाहिए.
  • इस दिन भजन कीर्तन का भी विशेष महत्व बताया गया है.
  • कोकिला व्रत पूजन में जल, पुष्प, बेलपत्र, दूर्वा, धूप, दीप इत्यादि अवश्य शामिल करें.
  • इस दिन निराहार व्रत रखा जाता है। इसके बाद सूर्यास्त के बाद पूजा अर्चना करके फलाहार ग्रहण किया जाता है.
  • कोकिला व्रत आषाढ़ पूर्णिमा से शुरू होकर श्रवण पूर्णिमा को समाप्त होता है.
  • वहीं, जो कुंवारी कन्याएं यह व्रत करती हैं उन्हें योग्य वर मिलता है.
  • इस दिन महिलाएं किसी पवित्र नदी या कुंड में स्नान करती हैं और मिट्टी से कोयल बनाकर उसकी पूजा करती हैं.
  • इस दिन महिलाएं ब्रह्मचर्य का पालन करें और मन को शांत बनाएं रखें.

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कोकिला व्रत कथा :

शिव पुराण के अनुसार ब्रह्माजी के मानस पुत्र दक्ष के घर पर देवी सती का जन्म हुआ था. सती भगवान शिव से विवाह करना चाहती थी, लेकिन दक्ष भगवान शिव से द्वेष करता था और वह इस विवाह के पक्ष में नहीं था. प्रजापति दक्ष भगवान विष्णु का भक्त था उसकी इच्छा के विरुद्ध देवी सती ने भगवान शिव से विवाह किया, इस वजह से दक्ष देवी सती से बहुत नाराज हुआ तथा भगवान शिव से बहुत क्रोधित हुआ. दक्ष ने भगवान शिव का अपमान करने के लिए एक महायज्ञ का आयोजन किया तथा सभी देवी देवताओं को आमंत्रित किया लेकिन सती और भगवान शिव को आमंत्रित नहीं किया.

जब देवी सती को इस यज्ञ की जानकारी लगी  तो वह भगवान शिव से यज्ञ में जाने के लिए अनुरोध करने लगी. लेकिन भगवान शिव ने यज्ञ में जाने से मना कर दिया देवी सती के बार-बार अनुरोध करने पर भगवान शिव ने सती को यज्ञ में जाने की आज्ञा दे दी. जब देवी सती दक्ष के घर पहुंची तो उसने भगवान शिव और सती को नहीं बुलाने का कारण पूछा तो दक्ष ने भगवान शिव का बहुत अपमान किया और उनके बारे में बेहद ही कठोर और कटु शब्द कहें. देवी सती बहुत दुखी हुई और उस यज्ञ के कुंड में ही कूदकर अपने प्राण त्याग दिए.

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देवी सती हुई शापित :

जब यह बात भगवान शिव को पता चली तो वे अत्यंत क्रोधित हो गई और उसने दक्ष का सिर उसके धड़ से अलग कर दिया और देवी सती से भी उनके इच्छा के विरुद्ध प्राण त्यागने के कारण बहुत नाराज हुए और उन्होंने देवी सती को हजारों वर्ष तक कोयल स्वरूप में रहने का श्राप दे दिया. श्राप के कारण देवी शक्ति हजारों वर्षों तक कोयल स्वरूप में रही और भगवान शिव की कठोर तपस्या की. माता सतीजी कोकिला बनकर दस हजार वर्षों तक नंदन वन में विचरती रहीं. जिसके बाद पार्वती का जन्म पाकर उन्होंने आषाढ़ में नियमित एक मास तक यह व्रत किया, जिसके परिणामस्वरूप भगवान शिव उन्हें पुनः पति के रूप में प्राप्त हुए.

कोकिला व्रत का महत्व :

हिंदू धर्म में कोकिला व्रत को बहुत पवित्र व्रत माना गया है. इस दिन महिलाएं विधि-विधान के अनुसार देवी सती और भगवान शिव की पूजा-आराधना करती हैं. विवाहित महिलाओं और कुंवारी कन्याओं के लिए यह व्रत बहुत महत्वपूर्ण और अनुकूल माना गया है. हिंदू धर्म की पौराणिक किवदंति के अनुसार जो विवाहिता महिलाएं इस दिन व्रत रखती हैं वह अपने जीवन में कभी विधवा नहीं होती हैं इसके साथ उनके पति की उम्र लंबी होती है. दूसरी ओर, जो कुंवारी कन्याएं क्या व्रत रखती हैं उन्हें मनचाहा वर प्राप्त होता है.

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