Bahula Chaturthi 2021: बहुला चतुर्थी 2021 कथा महत्व और व्रत विधि

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Bahula Chaturthi 2021 कथा महत्व और व्रत विधि :  25 अगस्त 2021, बुधवार को बहुला चतुर्थी है. भारत के कई प्रांतों में इसे संकट चौथ भी कहा जाता हैं. भाद्रपद माह की कृष्ण चतुर्थी को पशु प्रेम और धार्मिक परम्परा का निर्वहन करते हुए इसे मनाते हैं. इस दिन भगवान् श्री गणेश जी व्रत भी धारण किया जाता हैं. इस दिन हिंदू धर्म के प्रथम पूज्य भगवान श्री गणेश और गौ माता की पूरे श्रद्धा के साथ पूजा अर्चना भी की जाता हैं.

Bahula Chaturthi 2021 कथा महत्व और व्रत विधि

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25 अगस्त 2021 की सुबह से बहुला चतुर्थी का व्रत प्रारम्भ होगा. जो संध्या को चन्द्रदर्शन के साथ समाप्त होगा. इस दिन विशेषकर नवविवाहित महिलाएं स्नान कर पूर्ण श्रद्धा के साथ गणेश जी का व्रत आराधना आरम्भ करती हैं. जब शाम हो जाती हैं, तो पुन: नहा-धोकर भगवान् श्री गणेश जी की पूजा पाठ किया जाता है.

बहुला चतुर्थी के दिन दूध, दुर्वा, सुपारी, गंध, अक्षत गणेश जी को अर्ध्य चढ़ाया जाता हैं. पूर्ण भक्तिभाव से बहुला चतुर्थी का व्रत रखने से इंसानी जीवन की समस्त इच्छाएँ पूर्ण होती हैं.

साथ सारे मानसिक और शारीरिक रोग व कष्टों से मुक्ति मिलती हैं. इस दिन व्रत धारण करने भर से सन्तान और सुख-सम्पति की प्राप्ति होती हैं. बहुला चतुर्थी के दिन गेहूँ तथा चावल से बने उत्पादों का उपयोग करना पाप माना जाता है

बहुला चतुर्थी का महत्व

बहुला चौथ का पर्व मुख्य रूप से भारत के गुजरात और उत्तर प्रदेश में प्रसिद्ध हैं. गो-पालक भगवान श्री कृष्ण के भक्त मुख्य रूप से इन्हे मनाते हैं. कृषक समाज के इस त्यौहार में गाय, बछड़े और बैल की पूजा की जाती हैं.

कान्हा अपने सम्पूर्ण जीवन में गोचरण का कार्य किया करते थे. गाय कृषक की जिन्दगी का अहम हिस्सा होती हैं. कृषि कार्यो में उपयोगी होने के साथ-साथ गाय को भारतीय संस्कृति में माँ का दर्जा प्राप्त हैं. इस कारण इस पर्व का महत्व और बढ़ जाता हैं.

यह बहुला भगवान् श्री कृष्ण की प्रिय गाय थी. जिन्हें इनको बड़ा प्रेम था. भादों कृष्ण चौथ के गाय के दूध और चाय काफी पीने से परहेज करना चाहिए. माँ कही जाने वाली गाय के इन चीजो का बहुला चतुर्थी के दिन उपयोग करने से पाप लग सकता हैं.

बहुला चौथ कथा (Bahula Chauth Vrat Katha )

बहुला चतुर्थी की कथा में गाय और शेर के मध्य की मार्मिक कहानी बेहद प्रचलित हैं. कृष्ण जी ने अवतार के बाद बचपन और युवावस्था तक कई रास-लीलाए की. बड़े होने के पश्चात वे गायो के ग्वाले बन जाते हैं.

पिता नन्द बाबा की गौशाला से उनको गाय का एक छोटा सा बछड़ा उनका मन मोह लेता हैं. अब कृष्ण अपना अधिकतर समय इसी बहुला नामक गाय के साथ ही बिताते थे. जब वे गाये चारने जाते तो यह भी उनके साथ ही रहता था.

एक दिन कृष्ण बहुला की परीक्षा लेने के लिए जहाँ वह चरने जाती हैं, उपस्थित होकर उनका शिकार करने का बहाना करके आगे बढ़ते हैं, कि बहुला कहती हैं. मेरा बछड़ा सुबह से भूखा प्यासा हैं, मुझे उन्हें दूध पिलाने एक बार वापिस जाने दो. मै वापिस लौट आऊ तक मेरा भक्षण कर लेना.

इस बात पर बड़ी मुश्किल से कसम खाकर वह शेर से वापिस घर आने की अनुमति लेती हैं. नन्द की गौशाला आने के बाद बहुला अपने बछड़े को खूब प्यार दुलार कर दूध पिलाकर वापिस उस शेर की मांद पर जाती हैं. अपने वचन के मुताबिक वह शेर से कहती हैं. अब मेरा शिकार कर अपनी भूख मिटा लो.

तभी भगवान् कृष्ण अपने असली रूप में प्रकट होते हैं और बहुला से कहते हैं. बहुला ये तो तुम्हारी परीक्षा थी, आज तुम अपनी इस परीक्षा में सफल हुई. मै तुम्हे वर देता हु,, भादों की कृष्ण चतुर्थी आज से बहुला चतुर्थी के रूप में जानी जाएगी.

और पूरी मानव जाती तुम्हे माँ मानकर इस दिन तुम्हारी पूजा अर्चना करेगी. तथा इस दिन तुम्हारे लिए जो व्रत रखेगा उसकी मनोकामना पूरी होने के साथ ही सभी सुखो की प्राप्ति होगी.

बहुला चतुर्थी व्रत का संपूर्ण तरीका

इस व्रत के दिन परिवार का प्रत्येक सदस्य बहुला चतुर्थी का व्रत को स्वेच्छा से करता हैं. पूरे दिन व्रत रखने के बाद शाम के समय पूजा के साथ ही उपवास तोड़ा जाता हैं. मध्यप्रदेश, गुजरात और राजस्थान में बहुला चौथ को अलग-अलग तरीके से मनाया जाता हैं.

इस दिन गाय अथवा बछड़े को मिटटी का बनाया जाता हैं, जिनकी शाम को पूजा होती हैं. पूजा पाठ के बाद बहुला चतुर्थी कथा का वाचन होता हैं.

घर से बाहर या आंगन में खुले आसमा के निचे सभी परिवार के सदस्यों द्वारा उपवास तोडा जाता हैं. बहुला चतुर्थी के दिन मुख्य रूप से गाय के दूध से बनी किसी भी सामग्री का सेवन नही किया जाता हैं.

इस दिन सुबह जल्दी उठकर गाय को बाँधने की जगह साफ़ कर उन्हें हरा चारा खिलाया जाता हैं. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार बहुला चौथ के दिन गाय या बैल से किसी भी प्रकार का कार्य नहीं करवाया जाता है.

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