बिहार में समाजवादियों और वामपंथियों के गढ़ में इस बार अलग हैं चुनावी हालात

 बिहार में समाजवादियों और वामपंथियों के गढ़ में इस बार अलग हैं चुनावी हालात

2020 के चुनाव में वर्तमान विधायक वीरेंद्र कुमार सिन्हा समेत अन्य कई राजनीतिक दलों के लोग चुनावी ताल ठोंकने को प्रयासरत हैं

औरंगाबाद. बिहार में आगामी दिनों में विधानसभा चुनाव होना है. बिहार में चुनावी सरगर्मियां तेज़ हो गई हैं, बात पूरे बिहार की कर रहे है तो  औरंगाबाद जिले का ओबरा विधानसभा क्षेत्र कैसे अछूता रह सकता है. ओबरा में कुल 3,34,009 मतदाता है. यहां के वोटरों का मिज़ाज़ परिवर्तनशील है. जिसकी गवाही बीते चुनाव  परिणाम को देखकर लगाया जा सकता है.ओबरा के मतदाताओं के ने  कभी प्रजा सोशलिस्ट पार्टी को अपना मत दिया तो कभी जनता दल तो कभी सीपीआई (एम एल) को अपना आका चुना.

ओबरा विधान सभा क्षेत्र समाजवादी और वामपंथियों का गढ़ माना जाता है. वर्तमान के मतदाताओं ने इस मिथक को तोड़ दिया है. लोकदल, कांग्रेस, भाजपा तथा निर्दलीय को भी मतदाताओं ने चुनाव में जीतने का मौका दिया है. 1962 में कांग्रेस ने ओबरा में पैठ बनाई और दिलकेश्वर राम विधायक बने. 1967 में  कांग्रेस के आरके सिंह विधायक बने. 1969 के चुनाव में एक बार फिर प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के पदारथ सिंह विधायक बने.

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सियासी उठा पटक में शह-मात का खेल जारी रहा और 1972 में फिर कांग्रेस पार्टी के नारायण सिंह चुनाव जीते. 1977 में यहां की राजनीति में रामविलास सिंह का पदार्पण हुआ और वे तीन दफा विधायक बने, दो बार मंत्री भी रहे. 1977 में जनता पार्टी से, 1985 में लोक दल से और 1990 में जनता दल से वे विधायक चुने गए थे. इस बीच 1980 में भाजपा के वीरेंद्र सिंह भी विधायक बने.

साल 2010 में ओबरा थाना में पदस्थ दरोगा सोमप्रकाश सिंह निर्दलीय चुनाव लड़कर चुनाव जीते.सोमप्रकाश को 36816 वोट मिले. जदयू के प्रमोद सिंह चंद्रवंशी को 36014 वोटों के साथ ही संतोष करना पड़ा. 2015 में राजद के वीरेंद्र कुमार सिन्हा ने 56042 वोट लेकर चुनाव जीता जबकि रालोसपा के चंद्रभूषण वर्मा को 44,646 मत मिले.

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साल  2020 के चुनाव के लिए वर्तमान विधायक वीरेंद्र कुमार सिन्हा समेत अन्य कई राजनीतिक दलों के लोग यहां से चुनावी ताल ठोंकने को जी तोड़ मेहनत कर रहे हैं, लेकिन साल 2015 की तुलना में इस बार के हालात बदल गए हैं.  एनडीए के कुनबा से संबंध रखने वाले एक बार फिर से एकजुट है.

बड़ा सवाल यह है कि ऐसी स्थिति में क्या ? आरजेडी अपनी शाख बचा पाएगी, यज्ञ का प्रश्न है? दूसरा पहलु यह भी है हर बार चुनावों के दौरान लाख वादे किए जाते हैं, लेकिन चुनाव जीतने के बाद उसे ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है. क्षेत्र के लोगों की शुरु से दाउदनगर को जिला बनाने की मांग, ऐतिहासिक महत्व रखने वाले दाऊद खां के किले को पर्यटकीय दृष्टिकोण से विकसित किए जाने की मांग सहित क्षेत्र के कांसा-पीतल उद्योग को बढ़ावा दिए जाने की मांग मतदाताओं की प्राथमिकता है.

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2020 के चुनाव में वर्तमान विधायक वीरेंद्र कुमार सिन्हा समेत अन्य कई राजनीतिक दलों के लोग चुनावी ताल ठोंकने को प्रयासरत हैं

KAMLESH VERMA

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