अनंत चतुर्दशी व्रत कथा पूजन विधि । anant chaturdashi puja vidhi

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प्रतिकात्मक तस्वीर सोर्स सोशल मीडिया

अनंत चतुर्दशी व्रत कथा पूजन विधि  । anant chaturdashi puja vidhi

अनंत चतुर्दशी भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष को आती है। इस दिन भगवान अनंत का पूजन किया जाता है। मालूम हो कि भगवान श्रीकृष्ण का ही एक नाम अनंत है। इस पर्व को अनंत चौदस नाम से भी पुकारा जाता है। इस व्रत को अनंत फल देने वाला माना जाता है। व्रत को ग्रहों की अशुभता को दूर करने के लिए किया जाता है। प्राचीन मान्यता है कि 14 साल तक लगातार अनंत चतुर्दशी का व्रत रखने से विष्णु लोक की प्राप्ति होती है। अनंत चतुर्दशी के दिन ही भगवान श्रीगणेश का विसर्जन यानी बिदाई दी जाती है।

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प्रतिकात्मक तस्वीर सोर्स सोशल मीडिया

पाण्डवों ने भी किया था यह व्रत

पौराणिक लोक कथाओं में उल्लेख मिलता है कि, जब पाण्डव जुए में अपना सारा राज-पाट हार कर वन में कष्ट काट रहे थे, तभी भगवान श्रीकृष्ण ने पांडवों को अनंत चतुर्दशी का व्रत करने की युक्ति सुझाई थी। धर्मराज युधिष्ठिर ने अपने भाइयों तथा द्रौपदी के साथ पूरे विधि-विधान से यह व्रत किया तथा अनंत सूत्र धारण किया। लोक किदवंती के अनुसार अनंत चतुर्दशी व्रत के प्रभाव से ही पाण्डव सब संकटों से मुक्त हो गए। इसे भी पढ़ें: संकट चतुर्थी चौथ माता की कथा

अनंत चतुर्दशी व्रत पूजन विधि

अनंत चतुर्दशी व्रत करने वाले उपासकों को इस दिन अलसुबह उठकर किसी पवित्र नदी या सरोवर तट पर जाकर नहाना चाहिए और फिर कोई संकल्प करना चाहिए। जो लोग शहरों में रहते हैं वह पानी में गंगा जल की बूंदें डाल कर नहा सकते हैं। जिसके बाद कोई संकल्प लें। इसके बाद घर के पूजा गृह में कलश स्थापित करें। कलश पर शेषनाग की शैय्या पर लेटे भगवान विष्णु की मूर्ति अथवा चित्र को रख दे। जिसके बाद भगवान के चित्र के समक्ष चौदह गांठों से युक्त अनंत सूत्र रखें। इसके बाद पूजन करें। पूजन के बाद भगवान को मीठे व्यंजनों का ही भोग लगाया जाता है। खासकर खीर का भोग लगाए जाने का विशेष महत्व है।

भगवान अनंत की पूजा का मंत्र है− ओम अनंताय नमः।

पूजन के दौरान इन बातों का रखें ध्यान

चतुर्थी व्रत करने वाले उपासकों को नमक खाना मना है। चतुर्दशी के दिन भगवान की पूजा करके अनंत सूत्र बांधा जाता है। इस सूत्र को पुरुष दाहिने हाथ में और स्त्री बायें हाथ में बांधती हैं। पूजा में जब अनंत सूत्र बांध लें तो उसके बाद किसी ब्राह्मण को नैवेद्य में बने पकवान देकर स्वयं सपरिवार प्रसाद ग्रहण करें। पूजन के अंत में  व्रत−कथा को पढ़ें। इसे भी पढ़ें: मकर संक्रांति की शायरियाँ और महत्व | Makar Sankranti Messages and Importance in Hindi

अनंत चतुर्दशी व्रत कथा

कथा का सार−संक्षेप यह है− सतयुग में सुमन्तुनाम के एक मुनि हुआ करते थे। मुनि की पुत्री शीला अपने नाम के अनुरूप अत्यंत सुशील थीं। सुमन्तु मुनि ने उस कन्या का विवाह कौण्डिन्य मुनि से किया। कौण्डिन्य मुनि अपनी पत्नी शीला को लेकर जब ससुराल से घर वापस लौट रहे थे, इसी दौरान रास्ते में नदी के किनारे कुछ स्त्रियां अनंत भगवान की पूजा करते दिखाई पड़ीं।

मुनि की पुत्री शीला ने अनंत−व्रत का माहात्म्य जानकर उन स्त्रियों के साथ अनंत भगवान का पूजन करके अनंत सूत्र बांध लिया। इसके फलस्वरूप थोड़े ही दिनों में उसका घर धन−धान्य से पूर्ण हो गया। एक दिन कौण्डिन्य मुनि की दृष्टि अपनी पत्नी के बाएं हाथ में बंधे अनंत सूत्र पर पड़ी, जिसे देखकर वह भ्रमित हो गए और उन्होंने पूछा−क्या तुमने मुझे वश में करने के लिए यह सूत्र बांधा है?

शीला ने जवाब दिया− जी नहीं, यह अनंत भगवान का पवित्र सूत्र है। परंतु ऐश्वर्य के मद में अंधे हो चुके कौण्डिन्य ने अपनी पत्नी की सही बात को भी गलत समझा और अनंत सूत्र को जादू−मंतर वाला वशीकरण करने का डोरा समझकर तोड़ दिया।

इतना ही नहीं धागे को आग में डालकर जला दिया। जिसके बाद उनकी सारी संपत्ति नष्ट हो गई। कौण्डिन्य ऋषि ने अपने अपराध का प्रायश्चित करने का निर्णय लिया। वे अनंत भगवान से क्षमा मांगने के लिए वन में चले गए। और आत्महत्या करने के लिए विवश हो गए। एक वृद्ध ब्राह्मण ने आकर उन्हें आत्महत्या करने से रोक दिया और एक गुफा में ले जाकर चतुर्भुज अनंत देव का दर्शन कराया। इसे भी पढ़ें: विश्वामित्र कौन थे ? उनकी जयंती और कहानी | Vishwamitra Jayanti 2020 and Story In Hindi

भगवान ने मुनि से कहा− तुमने जो अनंत सूत्र का तिरस्कार किया है, यह सब उसी का फल है। कौण्डिन्य मुनि ने चौदह वर्ष तक अनंत व्रत का नियमपूर्वक पालन करके खोई हुई समृद्धि को पुनः प्राप्त कर लिया।