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2012 में सोच लिया था पंचतत्व में विलीन होने की बजाए करेंगे देहदान

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2012 में सोच लिया था पंचतत्व में विलीन होने की बजाए करेंगे देहदान | Had thought in 2012 that he would donate instead of dissolving into Panchatattva| सामाजिक कार्यकर्ता का देह पहुंचा उज्जैन

नागदा। कुछ लोग बिरले होते है। अलग सोच रखने की चाह के कारण वह दुनिया में नाम कर जाते हैं। ऐसा ही एक मामला प्रकाश में आया है। दरअसल पुराने ओवर निवासी दामोदर दुबे का निधन 20 नंवबर को हो गया।

दुबे की मंशा अनुसार बेटे सुभाष दुबे ने उज्जैन के आरडीगार्डी मेडिकल कॉलेज को फोन उनके देह के अस्पताल प्रबंधन को सौंप दिया।

सामाजिक कार्यों में हमेश अग्रणी रहने वाले दुबे ग्रेसिम उद्योग के विस्कोस विभाग में साल 1958 से 1970 तक फीटर के पद पर कार्य कर चुके हैं। परिजनों की मानें तो दुबे द्वारा साल 2012 में ही देहदान करने का निश्चिय किया था। जिसकी सूचना परिजनों को पूर्व में ही दे चुके थे।

#इसलिए आया विचार

परिजनों के बताएं अनुसार दामोदर दुबे द्वारा वर्ष 1965 में गायत्री परिवार नागदा की शाखाओं की स्थापना समीपस्थ क्षेत्रों में की गई थी। सामाजिक कार्य करने वाले दुबे को देहदान का विचार आध्यत्म कार्यों के दौरान ही आया।

साल 2012 में दुबे ने बिना किसी देरी करते हुए पंचतत्व में विलीन होने के बजाए अपने शरीर को मेडिकल सांइस के हवाले करने का मन बनाते हुए। उज्जैन आरडीगार्डी कॉलेज पहुंचकर संकल्प पत्र जमा कर दिया।

#ब्राह्मण कुल से फिर भी नहीं की परवाह

परिजनों की मानें तो दुबे सात्विक विचार के साथ सामाजिक कुरितियों के हमेशा से खिलाफ रहे हैं। मृत्यु भोज और मरणोपरांत होने वाले अन्य कार्यक्रमों को ना पसंद करने वाले दुबे ने पूरा जीवन गायत्री परिवार की शाखाओं के विस्तार में लगा दिया। मूल रुप से चिंतामण गणपति मंदिर के समीप बसे गांव लेकोड़ा निवासी है। दुबे के अहम सामाजिक कार्यों में उज्जैन मुल्लापुरा क्षेत्र में गायत्री शक्ति पीठ की स्थापना करना हैं।

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