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दंगवाड़ा मध्य प्रदेश में विराजित है अर्धनारीश्वर रूप में स्वयंभू शंकर,

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मध्य प्रदेश में ऐसा भी एक महादेव मंदिर : दंगवाड़ा मध्य प्रदेश में विराजित है अद्र्धनारीश्वर रूप में स्वयंभू शंकर, अभिषेक में कितना भी पानी डालो, जलाधारी से नहीं गिरता जमीन पर , आश्वर्य यह है कि, पानी कहां जाता है आ तक कोई नहीं लगा पाया पता

उज्जैन जिले के बडऩगर तहसील में एक ऐसा मंदिर भी है जहां भोले शंकर अद्र्धनारीश्वर रूप में विराजित है. शिवलिंग की जलाधारी पर चढ़ाया जाने वाला पानी कहां जाता है यह आज तक कोई पता नहीं लगा सका है. मंदिर बडऩगर तहसील के गांव दंगवाड़ा में चंबल तट किनारे बोरेश्वर महादेव के नाम से प्रसिद्ध है.

गर्भगृह में अद्र्धनारीश्वर रूप मतलब योनी की आकृति में लिंग दोनों से मिलकर स्वयंभू शिवलिंग मौजूद है. किवंति शिवलिंग को उत्तराखंड के केदारेश्वर के समान रुप का प्रतीक माना जाता है.

काले एरन पत्थर का शिवलिंग व जलाधारी दोनों साथ-साथ मौजूद है. खास बात यह है कि, बोरेश्वर महादेव के शिवलिंग पर अभिषेक करते समय कितनी भी मात्रा में जल चढ़ाया जाए जल जलाधारी से होकर नीचे नहीं गिरता, उलट प्रतिमा में ही समाहित हो जाता है.

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शिवलिंग व जलाधारी के बीच में एक साइड एक इंच तो दूसरी ओर एक हाथ की कलाई बराबर जगह मौजूद हैं. अभिषेक के दौरान चढ़ाए जाने वाला जल उक्त गेप में ही चला जाता है, लेकिन पानी कहां जाता है यह पता लगा पाना मुश्किल हैं. पानी कहा जाता है, कोई नहीं जानता.

दैनिक भास्कर में छपी रिपोर्ट की मानें तो शिवलिंग और जलाधारी के गेप के बीच कोई नाली या रिसाव जैसी स्थिति मौजूद नहीं है. इस बात के प्रमाण भास्कर के पास मौजूद हैं.

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मंदिर में तीन पीढिय़ों से लगातार पूजा करने वाले पुजारी जगदीश शर्मा ने जानकारी देते हुए बताया साल के 365 दिन किसी भी मौसम में शिवलिंग के नीचे पानी का स्तर बना रहता है. शिवलिंग पर कितनी भी मात्रा में पानी डाला जाए, वह प्रतिमा में समाहित हो जाता है, और नीचे मौजूद गेप में एक फीट तक पानी मौजूद रहता है.

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मंदिर की महत्वता देखते हुए पुरातत्व विभाग ने मंदिर को संरक्षित कर रखा है. पुजारी को बकायदा मप्र शासन की ओर से वेतन दिया जाता है. मंदिर के गर्भगृह के प्रवेश द्वार सर्प चिह्न मौजूद हैं.

मंदिर 4 हजार साल पुराना ह.ै बोरेश्वर महादेव मंदिर में अश्विनी शोध संस्थान महिदपुर के संस्थापक डॉ. आर.सी. ठाकुर कई बार रिसर्च कर चुके हैं. ठाकुर के अनुसार बोरेश्वर महादेव मंदिर में मौजूद प्रतिमा स्वयंभू है. मंदिर का निर्माण परमार काल में हुआ है, कारण समीप मौजूद स्थानों पर परमार कालीन वस्तुएं मिलती है.

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