भिखारी ठाकुर : बिहार के सारन जिले के देशी युवक की कहानी

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भोजपुरी संगीत अश्लीलता का पर्याय बनता जा रहा है. नाराज मत होइए. कारण यह है कि, हमारे भोजपुरियां युवा लगावे लू जब लिपिस्टक गाने से आगे नहीं बढ़ रहे है. लेकिन बिहारी की संस्कृति के इतिहास में झांक कर देखेंगे तो ऐसे-ऐसे महानायक के किस्से मिलेंगे.

जिनके नाट्य और कहानियों को पढऩे मात्र से लोगों के मन में बेटियों के प्रति सम्मान बढ़ गया. नाट्य कला के जरिए लोगों को बेटियों का महत्व बताने वाले भिखारी ठाकुर का रंग ही देशी है. 1887 के दौर में बिहार के सारन जिले में नाई समुदाय में भिखारी ठाकुर ने जन्म लिया.

1887 के दौर में पेशे जाति के आधार पर तय किए जाते थे. शुरुआती दिनों में भिखारी ठाकुर ने पिता के पेशे को अपनाया और लोगों के घर जाकर हैयर कटिंग करने लगे. युवा अवस्था में पहुंचने के बाद ठाकुर रोजगार की तलाश में बंगाल चले गए.

बचपन से ही कला के प्रति रुझान रखने वाले भिखारी का मन कोरा कागज था. बंगाल के मैदनीपुर जि़ले में ठाकुर ने रामलीला देखा. होना क्या था, रामलीला के दृश्यों ने ठाकुर के मन पर कब्जा कर लिया. फिर क्या ठाकुर ने बंगाली लोगों की एक मंडली बना ली.

मंडली सदस्यों ने रामलीला और रासलीला जैसे काव्यनाटकों का भोजपुरी भाषा में मंचन किया. प्रशंसा मिली तो मंडली ने नाच और नाटक की ओर रुख कर दिया. नाट्यों के मंचन की खास बात यह थी कि, भिखारी ठाकुर द्वारा गीत और नाटक स्वयं लिखे जाते थे.

इतना ही नहीं गीतों को खुद गाते थे. निर्देशन कार्य भी उनके ही हस्ते होता था. भिखारी ठाकुर के लोकप्रिय नाटक बिदेसिया, बेटी बेचवा, गबर घिचोर, कलयुग प्रेम, बिधवा-बिलाप और गंगा असनान शामिल है.

‘परदेसी परदेसी जाना नहीं’ हर किसी ने सुना है, लेकिन आपकों जानकर हैरानी होगी इसे भिखारी ठाकुर द्वारा कई दशक पहले लिखे गए बिदेसिया नाटक से लिया गया है. बिदेसिया नाटक के मुख्य किरदार की पत्नी सुन्दरी का पति घर छोड़ कर रोजगार की तलाश में चला जाता है.

प्यारी सुंदरी पति के वियोग को झेल नहीं पाती. दर्जनों वसंत बीत जाने के बाद भी बिदेसिया घर लौटकर नहीं आता है. सुंदरी पति के वियोग में डूब जाती है.

‘पिया गइले कलकतवा हे सजनी, तूर दिहलें पति-पत्नी के नतवा हे सजनी’

अर्थात सुंदरी पति वियोग में डूब जाती है और कलकत्ता गए अपने पति के लिए बटोही (संदेश ले जाने वाला) से संदेश भेजती. जिसे ‘बारहमासा’ कहते हैं। सुंदरी पति के बिना 12 माह गुजार देती है. बताया जाता है कि, नाटक में भिखारी ठाकुर खुद बटोही का किरदार में मंच पर उतरते थे.

‘आवे ला असाढ़ मास लगे ला अधिक आस

बरखा में पिया घरे अइतेन बटोहिया

पिया अइतेन बुनियां में राख लेतेन दुनियां में

पिया बिनु भावे न सवनवा बटोहिया’

गीत का अर्थ है कि, सुंदरी पति का केवल इंतज़ार करती है. पति के लौटने के इंतजार से ज्यादा सुंदरी घर में खुशियों के लौटने का इंतजार करती है. सुंदरी के दिल पर चोट तब लगती है जब पति कलकत्ता से सौतन लेकर घर लौटता है.

सुंदरी का हृदय कांप जाता है और रोने लगती है. पति प्रेम में डूबी हुई सुंदरी अंत में सौतन को स्वीकार कर लेती है. यह सच है उस दौर के समाज की एक कड़वी सच्चाई.

उस दौर में रोजगार की तलाश में युवा गांवों से पलायन करते थे. पत्नियां पति वियोग में उनका इंतजार करती थी. अनुरोध यह है कि, भोजपुरी को अशलीलता का पर्याय बताने के पहले भोजपुरी के इतिहास के पन्नों को एक बार जरुर खंगालें.

(आर्टिकल सोर्स : आर्टिकल को ऑडनारी टीम के साथ इंटर्नशिप कर रहीं यशस्वी पाठक ने लिखा है)

Bhikhari Thakur: The story of Desi Youth of Saran district of Bihar

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